कोच बिश्वेश्वर नंदी के साथ दीपा कर्मकार...
- 14 अगस्त को होगा दीपा कर्मकार का फाइनल मुकाबला
- क्वालिफाइंग राउंड में दीपा रहीं थीं आठवें स्थान पर
- बिश्वेश्वर नंदी हैं दीपा कर्मकार के जिम्नास्टिक कोच
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रियो डि जेनेरो:
भारत की दीपा कर्मकार ने जिम्नास्टिक के वॉल्ट इवेंट के फाइनल में जगह बनाकर देशवासियों में नई उम्मीदें जगा दी हैं, वहीं उनके कोच बिश्वेश्वर नंदी की रातों की नींद गायब है. हालांकि फाइनल मुकाबला 14 अगस्त को होना है, लेकिन इसकी गर्मजोशी अभी से महसूस की जाने लगी है. कोच नंदी जब अपनी शिष्या दीपा कर्मकार के साथ रियो पहुंचने के बाद ओलिंपिक एरेना में पहली बार पहुंचे थे, तो उनके शरीर में एक अलग ही सनसनी दौड़ गई और उनके मन में एक अलग ही प्रकार की उत्तेजना के साथ-साथ भय का भी संचार होने लगा...
इसके कुछ ही सेकंड बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि स्टार बन चुकी उनकी शिष्या के कंधों पर अब अरबों लोगों की उम्मीदों का बोझ है, क्योंकि देशवासी उनसे इतिहास रचने की उम्मीद कर रहे हैं, जिसमें उसे खरा उतरना ही है. इससे कोच नंदी पर भी दबाव बढ़ गया है और वह कुछ समझ नहीं पा रहे हैं कि यह सब कैसे होगा...
हर कोई कर रहा मेडल की उम्मीद
दीपा कर्मकार के रियो ओलिंपिक एरेना में अपने ट्रेडमार्क वॉल्ट के दौरान हवा में गोते लगाते हुए देखने के बाद रायटर्स से बातचीत में कहा, "मैं अत्यधिक प्रेशर में हूं. हर भारतवासी दीपा से रियो में इतिहास रचने की उम्मीद कर रहा है.'
उन्होंने आगे कहा, "हमें इसका अहसास है कि हम ऐसे अरबों भारतीयों की उम्मीदों को जी रहे हैं, जो यह नहीं समझते कि दीपा के लिए यहां मेडल हासिल करना कितना मुश्किल है.'
टेस्ट इवेंट ने बढ़ाया दबाव
टेस्ट इवेंट में मिली सफलता के बाद से ही भारत में दीपा की चर्चा शुरू हुई थी और अब वह उम्मीदों के बोझ तले दबी हुई महसूस कर रही हैं. कोच नंदी की चिंता यही है कि इससे उनके प्रदर्शन पर भी असर पड़ सकता है.
उन्होंने कहा, "चूंकि दीपा ने अप्रैल में रियो में ही आयोजित टेस्ट इवेंट में वॉल्ट में गोल्ड जीता था, इसलिए पूरा देश सोच रहा है कि वह गोल्ड लेकर ही देश लौटेंगी.' यह टेस्ट ईवेंट ही दीपा की पहचान बन गया है.'
गौरतलब है कि दीपा ने ग्लास्गो वर्ल्ड चैंपियनशिप में 0.4 अंक से ओलिंपिक के लिए क्वालिफाई करने का मौका गंवा दिया था. इसके बाद उन्होंने टेस्ट इवेंट में ही अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करते हुए ओलिंपिक के लिए क्वालिफाई करने वाली पहली भारतीय महिला होने का गौरव हासिल कर लिया था, लेकिन यह ऐसा इवेंट है जिसमें पैर के थोड़ा-सा भी इधर-उधर हो जाने, लैंडिंग और घुटने के थोड़ा-सा भी मुड़ जाने से भी मेडल की उम्मीदें खत्म हो जाती हैं. इसमें सफलता और विफलता के बीच एक महीन रेखा होती है.
14 अगस्त को अंतिम परीक्षा
दीपा कर्मकार को अब अपना फाइनल मुकाबला 14 अगस्त को खेलना है, जिसमें उन्हें अपनी सारी ताकत और हुनर झोंक देना पड़ेगा. वैसे भी वह वॉल्ट क्वालिफाइंग में अंतिम और 8वें स्थान पर रही हैं.
दीपा के कोच ने कहा, "वास्तव में इन सबसे मेरी रातों की नींद गायब हो गई है,. क्योंकि 0.001 अंक के अंतर से भी मेडल हाथ से निकल सकता है और भारतीयों की उम्मीदें बहुत अधिक हैं. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि उम्मीदों के इस बोझ का भार कैसे उठाऊं.'
सुविधाओं के अभाव में तराशा
गौरतलब है कि कोच नंदी के पास जब दीपा आई थीं, तो उनकी शारीरिक बनावय जिम्नास्टिक के लिए उपयुक्त नहीं थी. इसके साथ ही सुविधाओं और धन के अभाव में दीपा के लिए खुद के कौशल का उपयोग करके कई चीजें तैयार की थीं. इनमें बेकार हो चुके स्कूटर के सेकंडहैंड पुर्जों से स्प्रिंगबोर्ड बनाना और वॉल्ट के लिए कई मैट को एक के ऊपर एक जमाने का कार्य भी शामिल रहा.
उन्होंने कहा, "पहले मैं केवल लड़कों का ट्रेनिंग देता था. फिर दीपा मेरे पास आई. भारत में जब कोई पुरुष किसी महिला को ट्रेनिंग देता है, तो उसे अलग ही प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.'
22 साल की दीपा ने कहा, 'भारत में कुछ ही महीने पहले थोड़ी पहचान मिली और अब ऐसा लग रहा है कि इन ओलिंपिक में भारत की सारी उम्मीदें केवल दीपा से ही हैं.'
(इनपुट रायटर्स से)
इसके कुछ ही सेकंड बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि स्टार बन चुकी उनकी शिष्या के कंधों पर अब अरबों लोगों की उम्मीदों का बोझ है, क्योंकि देशवासी उनसे इतिहास रचने की उम्मीद कर रहे हैं, जिसमें उसे खरा उतरना ही है. इससे कोच नंदी पर भी दबाव बढ़ गया है और वह कुछ समझ नहीं पा रहे हैं कि यह सब कैसे होगा...
हर कोई कर रहा मेडल की उम्मीद
दीपा कर्मकार के रियो ओलिंपिक एरेना में अपने ट्रेडमार्क वॉल्ट के दौरान हवा में गोते लगाते हुए देखने के बाद रायटर्स से बातचीत में कहा, "मैं अत्यधिक प्रेशर में हूं. हर भारतवासी दीपा से रियो में इतिहास रचने की उम्मीद कर रहा है.'
उन्होंने आगे कहा, "हमें इसका अहसास है कि हम ऐसे अरबों भारतीयों की उम्मीदों को जी रहे हैं, जो यह नहीं समझते कि दीपा के लिए यहां मेडल हासिल करना कितना मुश्किल है.'
टेस्ट इवेंट ने बढ़ाया दबाव
टेस्ट इवेंट में मिली सफलता के बाद से ही भारत में दीपा की चर्चा शुरू हुई थी और अब वह उम्मीदों के बोझ तले दबी हुई महसूस कर रही हैं. कोच नंदी की चिंता यही है कि इससे उनके प्रदर्शन पर भी असर पड़ सकता है.
उन्होंने कहा, "चूंकि दीपा ने अप्रैल में रियो में ही आयोजित टेस्ट इवेंट में वॉल्ट में गोल्ड जीता था, इसलिए पूरा देश सोच रहा है कि वह गोल्ड लेकर ही देश लौटेंगी.' यह टेस्ट ईवेंट ही दीपा की पहचान बन गया है.'
गौरतलब है कि दीपा ने ग्लास्गो वर्ल्ड चैंपियनशिप में 0.4 अंक से ओलिंपिक के लिए क्वालिफाई करने का मौका गंवा दिया था. इसके बाद उन्होंने टेस्ट इवेंट में ही अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करते हुए ओलिंपिक के लिए क्वालिफाई करने वाली पहली भारतीय महिला होने का गौरव हासिल कर लिया था, लेकिन यह ऐसा इवेंट है जिसमें पैर के थोड़ा-सा भी इधर-उधर हो जाने, लैंडिंग और घुटने के थोड़ा-सा भी मुड़ जाने से भी मेडल की उम्मीदें खत्म हो जाती हैं. इसमें सफलता और विफलता के बीच एक महीन रेखा होती है.
14 अगस्त को अंतिम परीक्षा
दीपा कर्मकार को अब अपना फाइनल मुकाबला 14 अगस्त को खेलना है, जिसमें उन्हें अपनी सारी ताकत और हुनर झोंक देना पड़ेगा. वैसे भी वह वॉल्ट क्वालिफाइंग में अंतिम और 8वें स्थान पर रही हैं.
दीपा के कोच ने कहा, "वास्तव में इन सबसे मेरी रातों की नींद गायब हो गई है,. क्योंकि 0.001 अंक के अंतर से भी मेडल हाथ से निकल सकता है और भारतीयों की उम्मीदें बहुत अधिक हैं. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि उम्मीदों के इस बोझ का भार कैसे उठाऊं.'
सुविधाओं के अभाव में तराशा
गौरतलब है कि कोच नंदी के पास जब दीपा आई थीं, तो उनकी शारीरिक बनावय जिम्नास्टिक के लिए उपयुक्त नहीं थी. इसके साथ ही सुविधाओं और धन के अभाव में दीपा के लिए खुद के कौशल का उपयोग करके कई चीजें तैयार की थीं. इनमें बेकार हो चुके स्कूटर के सेकंडहैंड पुर्जों से स्प्रिंगबोर्ड बनाना और वॉल्ट के लिए कई मैट को एक के ऊपर एक जमाने का कार्य भी शामिल रहा.
उन्होंने कहा, "पहले मैं केवल लड़कों का ट्रेनिंग देता था. फिर दीपा मेरे पास आई. भारत में जब कोई पुरुष किसी महिला को ट्रेनिंग देता है, तो उसे अलग ही प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.'
22 साल की दीपा ने कहा, 'भारत में कुछ ही महीने पहले थोड़ी पहचान मिली और अब ऐसा लग रहा है कि इन ओलिंपिक में भारत की सारी उम्मीदें केवल दीपा से ही हैं.'
(इनपुट रायटर्स से)
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