नई दिल्ली:
रियो ओलिंपिक में भारत को अब तक लगभग हर दिन ही निराशा हाथ लगी है. किसी खेल विशेष में यदि कोई खुशी का मौका आया भी, तो वह फाइनल में जाकर गायब हो गया. अरबों देशवासियों की उम्मीदों को किसी न किसी रूप में बस हाथ लग रही है, तो निराशा... ऐसे में कुछ फैन्स को उन स्टार खिलाड़ियों की याद आने लगी है, जिनकी कमी इस ओलिंपिक में महसूस की जा रही है.
आइए एक नजर डालते हैं ऐसे ही कुछ खिलाड़ियों पर, जिन्होंने इससे पहले हमें कई बार गर्व के पल दिए...
सुशील कुमार (कुश्ती): व्यक्तिगत स्पर्धा में दो ओलिंपिक मेडल वाले पहले भारतीय
हालांकि अब तक ओलिंपिक में कुश्ती के मुकाबले शुरू नहीं हुए हैं, लेकिन नरसिंह से कोटा विवाद को लेकर चर्चा में रहे सुशील कुमार ने देश को कई बार गौरवशाली पल दिए हैं. विवादों से परे एक खिलाड़ी के रूप में उनकी उपलब्धियां खास रही हैं. सुशील ऐसे पहलवान हैं , जिन्हें व्यक्तिगत स्पर्धा में दो बार ओलिंपिक मेडल जीतने वाला पहला भारतीय होने का गौरव हासिलॉ है. अब उनकी जगह नरसिंह यादव 74 किग्रा भार वर्ग में देश का प्रतिनिधित्व करेंगे. हालांकि अभी नरसिंह की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन सुशील पर जो भरोसा है, वह किसी और पहलवान पर नहीं हो सकता. सुशील को इसलिए बाहर होना पड़ा था, क्योंकि उन्होंने 2014 के कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद से किसी भी स्पर्धा में भाग नहीं लिया था और नरसिंह ने ओलिंपिक के लिए कोटा हासिल कर लिया था. सुशील ने इसके लिए कोर्ट में भी लड़ाई लड़ी थी, लेकिन फैसला तो नरसिंह के पक्ष में ही गया.

कुछ दिनों पहले उन्होंने खुलासा किया था कि 2008 बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद उन्हें ‘शीर्ष पर रहते हुए संन्यास’ लेने की सलाह दी गई थी, जबकि उनमें काफी खेल बाकी था और उन्होंने इसे 4 साल बाद 2012 के लंदन ओलिंपिक में साबित भी किया था और रजत जीत लिया था. इतना ही नहीं बीजिंग ओलिंपिक में उन्होंने भारत का कुश्ती में 52 साल पुराना सूखा समाप्त करते हुए नया इतिहास रचा था. उनसे पहले केडी जाधव ने 1952 में ओलिंपिक पदक जीता था.
एमसी मैरीकॉम (महिला बॉक्सिंग): 5 बार की वर्ल्ड चैंपियन + ओलिंपिक मेडल
मैरीकॉम ने भारतीय महिला बॉक्सिंग को एक नया आयाम दिया है. वह देश की महान बॉक्सरों में से एक हैं. मैरीकॉम को ओलिंपिक मेडल जीतने वाली देश की पहली महिला बॉक्सर होने का गौरव हासिल है. उन्होंने 4 साल पहले लंदन ओलिंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीतते हुए देश का नाम रोशन किया था. हालांकि ओलिंपिक के लिए वह क्वालिफाई नहीं कर पाईं थीं और वर्ल्ड चैंपियनशिप के दूसरे राउंड में हार गई थीं. हालांकि खेल में हार-जीत तो होती रहती है और कई बार बड़े खिलाड़ी बड़े मौकों पर ज्यादा बेहतरीन खेल दिखाते हैं. ऐसे में मैरीकॉम के रहते एक उम्मीद की किरण तो रहती ही. देश के बॉक्सिंग एशोसिएशन ने उनके लिए वाइल्ड कार्ड की कोशिश भी की थी, लेकिन सफलता नहीं मिली.
5 बार वर्ल्ड चैंपियन रही इस महिला मुक्केबाज की कमी निश्चित रूप से ओलिंपिक में खलेगी. उन्होंने अभी संन्यास भी नहीं लिया है और अपना खेल जारी रखा है.
विजय कुमार (शूटिंग) : सर्जरी से गुजरे, अब 2020 के लिए कर रहे तैयारी
आर्मी मार्क्समैन विजय कुमार 4 साल पहले लंदन ओलिंपिक में रजत पदक जीतकर देश को गौरवशाली पल दिया था. हालांकि 30 साल के विजय जनवरी में आयोजित रियो ओलिंपिक के क्वालिफायर में हार गए थे. दरअसल लंदन ओलिंपिक के बाद विजय को स्वास्थ्य कारणों से काफी संघर्ष करना पड़ा. 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल के इस खिलाड़ी को दो सर्जरी करानी पड़ी थी और इसके बाद वह इससे उबरने के लिए उपचार ले रहे थे. इसके साथ ही 2014 में स्लिप-डिस्क के कारण उन्हें अपनी तकनीक में भी बदलाव करना पड़ा था. 
उन्होंने इस असफलता के बाद कहा था, 'ये मेरे जीवन का सबसे मुश्किल दिन नहीं है. कई दूसरे टूर्नामेंट में भी मैं बहुत नज़दीक आकर मेडल नहीं जीत पाया. मेरे लिए सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है. यकीनन 2020 ओलिंपिक मेरा अगला टारगेट है.'
रंजन सिंह सोढ़ी (शूटिंग) : कॉमनवेल्थ में दो बार जीता पदक
वर्ल्ड नंबर वन रह चुके एशियाई चैंपियन रंजन सिंह सोढ़ी से रियो ओलिंपिक में पदक की उम्मीद थी, लेकिन वह यहां भाग ही नहीं ले पाए. लंदन ओलिंपिक में भी उनका प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा था और कोई पदक नहीं जीत पाए थे, लेकिन उनकी योग्यता को देखते हुए रियो में कमाल की उम्मीद थी. कॉमनवेल्थ गेम्स में दो बार पदक जीत चुके सोढ़ी ने पिछले साल केरल में नेशनल चैंपियनशिप में डबल ट्रैप शूटिंग में गोल्ड जीता था. वर्तमान में वह आउट ऑफ फॉर्म भी थे और ग्लास्गो कॉमवेल्थ गेम्स और एशियाई खेल, 2014 की टीम में जगह नहीं बना पाए थे. फिर भी उनका अनुभव उन्हें पदक दिला सकता था.

पी कश्यप (बैडमिंटन): चोट ने दिया धोखा
भारतीय पुरुष बैडमिंटन का एक बड़ा नाम रियो ओलिंपिक टीम से गायब है. कश्यप रियो में पदक की उम्मीद हो सकते थे. दरअसल वह क्वालिफायर में नहीं फेल हुए थे, बल्कि उनकी किस्मत ने साथ नहीं दिया था. इतना ही नहीं यह ऐसा झटका था कि उनका दिल टूट गया. दरअसल जर्म ओपन के दौरान उनके घुटने में जबर्दस्त चोट लगी थी, जिससे वह उबर नहीं पाए और कॉमनवेल्थ गेम्स के इस गोल्ड मेडल विजेता को अपनी रैंकिंग टॉप 16 तक लाने में सफलता नहीं मिल पाई. गौरतलब है कि मई, 2016 तक टॉप 16 में रहने वाले खिलाड़ियों को ही रियो का टिकट मिलना था. हैदराबाद का 29 साल का यह खिलाड़ी लंदन ओलिंपिक में क्वार्टर फाइनल तक पहुंचा था. ऐसे में इस बार उनसे मेडल की उम्मीद थी.

इन खिलाड़ियों की कमी तो हमें खलेगी ही, लेकिन हमें रियो ओलिंपिक में भाग ले रहे खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करना होगा, जिससे बची हुई सपर्धाओं में हमारे प्रतिभागी कुछ कमाल कर पाएं.
आइए एक नजर डालते हैं ऐसे ही कुछ खिलाड़ियों पर, जिन्होंने इससे पहले हमें कई बार गर्व के पल दिए...
सुशील कुमार (कुश्ती): व्यक्तिगत स्पर्धा में दो ओलिंपिक मेडल वाले पहले भारतीय
हालांकि अब तक ओलिंपिक में कुश्ती के मुकाबले शुरू नहीं हुए हैं, लेकिन नरसिंह से कोटा विवाद को लेकर चर्चा में रहे सुशील कुमार ने देश को कई बार गौरवशाली पल दिए हैं. विवादों से परे एक खिलाड़ी के रूप में उनकी उपलब्धियां खास रही हैं. सुशील ऐसे पहलवान हैं , जिन्हें व्यक्तिगत स्पर्धा में दो बार ओलिंपिक मेडल जीतने वाला पहला भारतीय होने का गौरव हासिलॉ है. अब उनकी जगह नरसिंह यादव 74 किग्रा भार वर्ग में देश का प्रतिनिधित्व करेंगे. हालांकि अभी नरसिंह की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन सुशील पर जो भरोसा है, वह किसी और पहलवान पर नहीं हो सकता. सुशील को इसलिए बाहर होना पड़ा था, क्योंकि उन्होंने 2014 के कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद से किसी भी स्पर्धा में भाग नहीं लिया था और नरसिंह ने ओलिंपिक के लिए कोटा हासिल कर लिया था. सुशील ने इसके लिए कोर्ट में भी लड़ाई लड़ी थी, लेकिन फैसला तो नरसिंह के पक्ष में ही गया.

कुछ दिनों पहले उन्होंने खुलासा किया था कि 2008 बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद उन्हें ‘शीर्ष पर रहते हुए संन्यास’ लेने की सलाह दी गई थी, जबकि उनमें काफी खेल बाकी था और उन्होंने इसे 4 साल बाद 2012 के लंदन ओलिंपिक में साबित भी किया था और रजत जीत लिया था. इतना ही नहीं बीजिंग ओलिंपिक में उन्होंने भारत का कुश्ती में 52 साल पुराना सूखा समाप्त करते हुए नया इतिहास रचा था. उनसे पहले केडी जाधव ने 1952 में ओलिंपिक पदक जीता था.
एमसी मैरीकॉम (महिला बॉक्सिंग): 5 बार की वर्ल्ड चैंपियन + ओलिंपिक मेडल
मैरीकॉम ने भारतीय महिला बॉक्सिंग को एक नया आयाम दिया है. वह देश की महान बॉक्सरों में से एक हैं. मैरीकॉम को ओलिंपिक मेडल जीतने वाली देश की पहली महिला बॉक्सर होने का गौरव हासिल है. उन्होंने 4 साल पहले लंदन ओलिंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीतते हुए देश का नाम रोशन किया था. हालांकि ओलिंपिक के लिए वह क्वालिफाई नहीं कर पाईं थीं और वर्ल्ड चैंपियनशिप के दूसरे राउंड में हार गई थीं. हालांकि खेल में हार-जीत तो होती रहती है और कई बार बड़े खिलाड़ी बड़े मौकों पर ज्यादा बेहतरीन खेल दिखाते हैं. ऐसे में मैरीकॉम के रहते एक उम्मीद की किरण तो रहती ही. देश के बॉक्सिंग एशोसिएशन ने उनके लिए वाइल्ड कार्ड की कोशिश भी की थी, लेकिन सफलता नहीं मिली.
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विजय कुमार (शूटिंग) : सर्जरी से गुजरे, अब 2020 के लिए कर रहे तैयारी
आर्मी मार्क्समैन विजय कुमार 4 साल पहले लंदन ओलिंपिक में रजत पदक जीतकर देश को गौरवशाली पल दिया था. हालांकि 30 साल के विजय जनवरी में आयोजित रियो ओलिंपिक के क्वालिफायर में हार गए थे. दरअसल लंदन ओलिंपिक के बाद विजय को स्वास्थ्य कारणों से काफी संघर्ष करना पड़ा. 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल के इस खिलाड़ी को दो सर्जरी करानी पड़ी थी और इसके बाद वह इससे उबरने के लिए उपचार ले रहे थे. इसके साथ ही 2014 में स्लिप-डिस्क के कारण उन्हें अपनी तकनीक में भी बदलाव करना पड़ा था.

उन्होंने इस असफलता के बाद कहा था, 'ये मेरे जीवन का सबसे मुश्किल दिन नहीं है. कई दूसरे टूर्नामेंट में भी मैं बहुत नज़दीक आकर मेडल नहीं जीत पाया. मेरे लिए सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है. यकीनन 2020 ओलिंपिक मेरा अगला टारगेट है.'
रंजन सिंह सोढ़ी (शूटिंग) : कॉमनवेल्थ में दो बार जीता पदक
वर्ल्ड नंबर वन रह चुके एशियाई चैंपियन रंजन सिंह सोढ़ी से रियो ओलिंपिक में पदक की उम्मीद थी, लेकिन वह यहां भाग ही नहीं ले पाए. लंदन ओलिंपिक में भी उनका प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा था और कोई पदक नहीं जीत पाए थे, लेकिन उनकी योग्यता को देखते हुए रियो में कमाल की उम्मीद थी. कॉमनवेल्थ गेम्स में दो बार पदक जीत चुके सोढ़ी ने पिछले साल केरल में नेशनल चैंपियनशिप में डबल ट्रैप शूटिंग में गोल्ड जीता था. वर्तमान में वह आउट ऑफ फॉर्म भी थे और ग्लास्गो कॉमवेल्थ गेम्स और एशियाई खेल, 2014 की टीम में जगह नहीं बना पाए थे. फिर भी उनका अनुभव उन्हें पदक दिला सकता था.

पी कश्यप (बैडमिंटन): चोट ने दिया धोखा
भारतीय पुरुष बैडमिंटन का एक बड़ा नाम रियो ओलिंपिक टीम से गायब है. कश्यप रियो में पदक की उम्मीद हो सकते थे. दरअसल वह क्वालिफायर में नहीं फेल हुए थे, बल्कि उनकी किस्मत ने साथ नहीं दिया था. इतना ही नहीं यह ऐसा झटका था कि उनका दिल टूट गया. दरअसल जर्म ओपन के दौरान उनके घुटने में जबर्दस्त चोट लगी थी, जिससे वह उबर नहीं पाए और कॉमनवेल्थ गेम्स के इस गोल्ड मेडल विजेता को अपनी रैंकिंग टॉप 16 तक लाने में सफलता नहीं मिल पाई. गौरतलब है कि मई, 2016 तक टॉप 16 में रहने वाले खिलाड़ियों को ही रियो का टिकट मिलना था. हैदराबाद का 29 साल का यह खिलाड़ी लंदन ओलिंपिक में क्वार्टर फाइनल तक पहुंचा था. ऐसे में इस बार उनसे मेडल की उम्मीद थी.

इन खिलाड़ियों की कमी तो हमें खलेगी ही, लेकिन हमें रियो ओलिंपिक में भाग ले रहे खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करना होगा, जिससे बची हुई सपर्धाओं में हमारे प्रतिभागी कुछ कमाल कर पाएं.
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