- मैं अपने करियर से खुश हूं
- आप हर दिन गोल्ड मेडल नहीं जीत सकते
- मैंने जितने दिन खेला, पूरी निष्ठा के साथ खेला
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रियो:
ओलंपिक के इतिहास में भारत के एकमात्र व्यक्तिगत गोल्ड मेडल विजेता अभिनव बिंद्रा रियो ओलंपिक में चौथे स्थान पर रहे. वे यहां बहुत कम अंतर से ब्रॉन्ज मेडल पर निशाना लगाने से चूक गए. अभिनव बिंद्रा के रियो छोड़ने से पहले एनडीटीवी संवाददाता विमल मोहन ने उनके साथ एक्सक्लूसिव बातचीत की. पढें उसी इंटरव्यू के कुछ अंश
आपने करीब दो दशक तक भारतीय प्रशंसकों का सिर गर्व से ऊंचा किए रखा, अपने करियर की आखिरी प्रतियोगिता खेलने के बाद क्या आप कह सकते हैं कि आप अपने करियर से संतुष्ट हैं?
अभिनव - बिल्कुल. मैं अपने करियर से खुश हूं. जो मैं हासिल करना चाहता था, वो मैंने किया. रियो में आखिरी दिन मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. यह और बात है कि वो मेडल के लिए काफी नहीं था. लेकिन कुल मिलाकर मैं अपने प्रदर्शन से संतुष्ट हूं.
बीजिंग में गोल्ड मेडल जीतने के बाद भी आपने हमसे बात करते हुए कहा था कि आप संतुष्ट हैं और आज भी रियो में आपसे बात हो रही है तो कह रहे हैं कि आप संतुष्ट हैं, लेकिन दोनों ही हालात में आप कितना फर्क महसूस करते हैं?
अभिनव - देखिए मैं अपनी बहुत अच्छी तैयारी के साथ यहां आया. मैंने अपना बेहतरीन प्रदर्शन करने की कोशिश की. लेकिन आप हर दिन गोल्ड मेडल नहीं जीत सकते. किसी को तो चौथे नंबर पर भी रहना होता है, आज मेरी बारी थी.
पहले जब खिलाड़ी आते थे तो ओलंपिक का हिस्सा बनना उनका मकसद होता था, आज खिलाड़ी मेडल जीतने की बात करते हैं. क्या आपको लगता है कि पिछले 10 साल में भारतीय खेलों का स्तर ऊपर उठा है?
अभिनव - बिल्कुल, खेलों का स्तर ऊपर उठा है. जितना आगे जाना चाहिए था, वहां तक पहुंचने के लिए कई दिशाओं से कोशिश करनी होगी. ग्रास रूट लेवल पर काम करने की ज्यादा जरूरत है. कॉर्पोरेट को और दिल खोलकर भारतीय खेलों को सपोर्ट करने की जरूरत होगी, तभी हम जितने मेडल की उम्मीद करते हैं, उस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं.
इन हालातों में शोभा डे जैसी बुद्धिजीवियों के कमेंट का खिलाड़ियों पर क्या असर हो सकता है, इस पर आपकी क्या राय है?
अभिनव - देखिए बात जीत और हार की नहीं है, खेलों को अगर आगे बढ़ाना है, तो सबकी कोशिश जरूरी है. मैं फिर वही कहूंगा कि अगर कॉर्पोरेट सेक्टर दिल खोलकर हाथ बढ़ाए, ग्रासरूट लेवल से ही खिलाड़ियों पर ध्यान दिया जाए, तभी हम ज्यादा मेडल्स की उम्मीद कर सकते हैं.
आप क्या चाहेंगे कि आपके प्रशंसक आपको कैसे याद रखें?
अभिनव - मैं यह फैसला नहीं कर सकता कि वे मुझे कैसे याद रखें. मैंने जितने दिन खेला, पूरी निष्ठा के साथ खेला और मैं अपने आखिरी ओलंपिक में भी दुनिया का चौथे नंबर का खिलाड़ी रहा. मैंने जितना खेला, मैं उस सबसे बहुत संतुष्ट हूं.
आपने करीब दो दशक तक भारतीय प्रशंसकों का सिर गर्व से ऊंचा किए रखा, अपने करियर की आखिरी प्रतियोगिता खेलने के बाद क्या आप कह सकते हैं कि आप अपने करियर से संतुष्ट हैं?
अभिनव - बिल्कुल. मैं अपने करियर से खुश हूं. जो मैं हासिल करना चाहता था, वो मैंने किया. रियो में आखिरी दिन मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. यह और बात है कि वो मेडल के लिए काफी नहीं था. लेकिन कुल मिलाकर मैं अपने प्रदर्शन से संतुष्ट हूं.
बीजिंग में गोल्ड मेडल जीतने के बाद भी आपने हमसे बात करते हुए कहा था कि आप संतुष्ट हैं और आज भी रियो में आपसे बात हो रही है तो कह रहे हैं कि आप संतुष्ट हैं, लेकिन दोनों ही हालात में आप कितना फर्क महसूस करते हैं?
अभिनव - देखिए मैं अपनी बहुत अच्छी तैयारी के साथ यहां आया. मैंने अपना बेहतरीन प्रदर्शन करने की कोशिश की. लेकिन आप हर दिन गोल्ड मेडल नहीं जीत सकते. किसी को तो चौथे नंबर पर भी रहना होता है, आज मेरी बारी थी.
पहले जब खिलाड़ी आते थे तो ओलंपिक का हिस्सा बनना उनका मकसद होता था, आज खिलाड़ी मेडल जीतने की बात करते हैं. क्या आपको लगता है कि पिछले 10 साल में भारतीय खेलों का स्तर ऊपर उठा है?
अभिनव - बिल्कुल, खेलों का स्तर ऊपर उठा है. जितना आगे जाना चाहिए था, वहां तक पहुंचने के लिए कई दिशाओं से कोशिश करनी होगी. ग्रास रूट लेवल पर काम करने की ज्यादा जरूरत है. कॉर्पोरेट को और दिल खोलकर भारतीय खेलों को सपोर्ट करने की जरूरत होगी, तभी हम जितने मेडल की उम्मीद करते हैं, उस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं.
इन हालातों में शोभा डे जैसी बुद्धिजीवियों के कमेंट का खिलाड़ियों पर क्या असर हो सकता है, इस पर आपकी क्या राय है?
अभिनव - देखिए बात जीत और हार की नहीं है, खेलों को अगर आगे बढ़ाना है, तो सबकी कोशिश जरूरी है. मैं फिर वही कहूंगा कि अगर कॉर्पोरेट सेक्टर दिल खोलकर हाथ बढ़ाए, ग्रासरूट लेवल से ही खिलाड़ियों पर ध्यान दिया जाए, तभी हम ज्यादा मेडल्स की उम्मीद कर सकते हैं.
आप क्या चाहेंगे कि आपके प्रशंसक आपको कैसे याद रखें?
अभिनव - मैं यह फैसला नहीं कर सकता कि वे मुझे कैसे याद रखें. मैंने जितने दिन खेला, पूरी निष्ठा के साथ खेला और मैं अपने आखिरी ओलंपिक में भी दुनिया का चौथे नंबर का खिलाड़ी रहा. मैंने जितना खेला, मैं उस सबसे बहुत संतुष्ट हूं.
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