आमतौर पर यह धारणा प्रचलित है कि सिनेमा जगत में लंबी कद-काठी और आकर्षक चेहरा ही सफलता की पहली सीढ़ी हैं, लेकिन राजपाल यादव ने यह सिद्ध कर दिया कि कला शारीरिक मापदंडों की मोहताज नहीं होती. वह केवल समर्पण और साधना की अपेक्षा रखती है. कद की ऊंचाई कम होने के बावजूद उनके अभिनय का फलक बहुत बड़ा है.
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के कुंडरा गांव में 15 मार्च को जन्मे राजपाल यादव ने बचपन में कभी नहीं सोचा था कि बड़े होकर एक्टर बनना है, लेकिन स्कूलिंग पूरी करने के बाद उन्होंने आर्ट थिएटर ज्वाइन किया और मन बना लिया कि अब जो करना है वह कला के क्षेत्र में ही करना है. बहुत कम लोग जानते हैं कि अभिनय की बारीकियों को सीखने के लिए अभिनेता ने शिक्षा के क्षेत्र में भी एक लंबी यात्रा तय की. ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद उन्होंने लखनऊ का रुख किया और भारतीय नाट्य अकादमी में पढ़ाई की और फिर दिल्ली के मशहूर कला संस्थान एनएसडी का हिस्सा रहे.
इस सफर में पांच साल की लंबी ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने हर चीज को बारीकी से सीखा. राजपाल यादव के करियर की शुरुआत भी आसान नहीं थी. उन्होंने फिल्मों से पहले कई नाटकों में साइड रोल किए लेकिन खास पहचान नहीं मिली, लेकिन पहली फिल्म 'शूल' में एक छोटे से रोल में वह निर्माता-निर्देशक राम गोपाल वर्मा की नजर में आ गए. राम गोपाल वर्मा ने अभिनेता की तारीफ की, लेकिन राजपाल यादव को यकीन नहीं हुआ कि छोटे से रोल की वजह से उन्हें तारीफ मिल रही है. यही वजह रही कि फिल्म 'जंगल' के बनने से पहले उन्होंने आरजीवी से मुलाकात नहीं की, लेकिन निर्देशक इतने प्रभावित थे कि वे खुद उनसे मिलने के लिए पहुंच गए.
अभिनेता को लगा था कि जंगल जैसी फिल्म में सभी बड़े स्टार्स है और उनके जैसे छोटे कद-काठी वाले के लिए क्या ही काम होगा लेकिन उन्हें 'सिप्पा' नाम के खतरनाक डाकू का रोल दिया गया. उस वक्त निर्देशक के खास तौर पर यह बात अभिनेता से कही थी कि किरदार आपके लिए ही लिखा गया. फिल्म में सुनील शेट्टी, फरदीन खान और उर्मिला मातोंडकर जैसे बड़े स्टार्स थे लेकिन फिर भी अभिनेता अलग पहचान बनाने में कामयाब रहे. जंगल उनके करियर की हिट फिल्म रही और उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
राजपाल यादव सिर्फ कमीडियन नहीं हैं, बल्कि हर रोल में खुद को ढाल लेते हैं. बात चाहे 'भूल भुलैया' का नटवर उर्फ छोटा पंडित हो या 'मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं.' फिल्म की, दोनों ही किरदार एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थे, लेकिन दोनों ही किरदारों को राजपाल यादव ने जीवंत कर दिया. अभिनेता न सिर्फ हंसाने की हिम्मत रखते हैं, बल्कि रुलाने का जज्बा भी रखते हैं.