वो हिंदी फिल्म, जिसके मेल एक्टर ने विदेश में जीता 'बेस्ट एक्ट्रेस' का अवार्ड, पर भारत में नहीं हो पाई रिलीज, IMDb रेटिंग 7.1

इस मेल एक्टर ने इंटरनेशनल 'बेस्ट एक्ट्रेस' का अवॉर्ड जीता है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है और लिम्बा बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में इस एक्टर का नाम दर्ज है.

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1996 में आई थी निर्मल पांडे की फिल्म दायरा

बॉलीवुड में कई मेल एक्टर्स ने पर्दे पर महिला या ट्रांसजेंडर के किरदार निभाए हैं. 'चाची 420' में कमल हासन से लेकर 'लक्ष्मी' में अक्षय कुमार तक, इन एक्टर्स के काम ने जमकर तारीफ तो बटोरी लेकिन वह दर्जा नहीं मिला जो 90 के दशक के इस एक्टर को मिला. एक एक्टर जिसने इस तरह के रोल में ऐसा परफेक्शन दिखाया कि उसे दुनिया भर में जाना जाने वाला एक बड़ा अवार्ड हासिल हुआ. इस मेल एक्टर ने इंटरनेशनल 'बेस्ट एक्ट्रेस' का अवॉर्ड जीता है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है और लिम्बा बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में इस एक्टर का नाम दर्ज है.

कौन है वो एक्टर?

हम जिस एक्टर की बात कर रहे हैं वो निर्मल पांडे हैं. 1996 में, निर्मल पांडे ने 'दायरा' फिल्म में काम किया, जिसे दिग्गज एक्टर-फिल्ममेकर अमोल पालेकर ने डायरेक्ट किया था. क्रिटिक्स द्वारा सराही गई इस फिल्म में जेंडर पहचान, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, ट्रॉमा और सामाजिक भेदभाव जैसे विषयों को दिखाया गया था. ऐसे विषय जिन पर उस समय भारतीय सिनेमा में शायद ही कभी खुलकर बात होती थी. इस फिल्म में, निर्मल पांडे ने एक ट्रांसजेंडर का रोल निभाया, जिसका एक ऐसी महिला के साथ गहरा भावनात्मक रिश्ता बन जाता है जो यौन उत्पीड़न के ट्रॉमा से उबरने की कोशिश कर रही होती है. इस महिला का रोल सोनाली कुलकर्णी ने निभाया था. दोनों एक्टर्स को उनकी संवेदनशील और दमदार परफॉर्मेंस के लिए खूब तारीफ मिली.

निर्मल को मिला इंटरनेशनल अवार्ड

1997 में फ्रांस में हुए 'वैलेनसिएन्स इंटरनेशनल फेस्टिवल ऑफ एक्शन एंड एडवेंचर फिल्म्स' में, निर्मल पांडे और सोनाली कुलकर्णी ने 'दायरा' में अपनी परफॉर्मेंस के लिए संयुक्त रूप से 'बेस्ट एक्ट्रेस' का अवॉर्ड जीता. इसके साथ ही, निर्मल इंटरनेशनल 'बेस्ट एक्ट्रेस' का सम्मान जीतने वाले एकमात्र भारतीय मेल (पुरुष) एक्टर बन गए. इस अनोखी उपलब्धि को बाद में 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' में भी जगह मिली.

भारत में नहीं हो पाई रिलीज

क्रिटिक्स से मिली सराहना के बावजूद, दायरा को भारत में सिनेमाघरों में रिलीज होने में काफी संघर्ष करना पड़ा. फिल्म में लैंगिक पहचान और हिंसा जैसे विषयों को 1990 के दशक के हिसाब काफी बोल्ड विषय माना गया. केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने कथित तौर पर कुछ डायलॉग्स और सीन्स पर आपत्ति जताई थी. फिल्म को एडिट करने के बाद एडल्ट का दर्जा मिला, लेकिन फिर भी देश में इसे कभी भी सिनेमाघरों में रिलीज नहीं किया गया. हालांकि समय के साथ फिल्म को कल्ट का दर्जा मिल गया.

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