बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता सुनील दत्त की अपने बेटे संजय दत्त के साथ बॉन्डिंग बेहद खास और दिलचस्प रही. खासकर फिल्म 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' के दौरान उनके बीच के मस्ती भरे पल आज भी फिल्म इंडस्ट्री में याद किए जाते हैं. एक बार तो उन्होंने मजाक में डायरेक्टर से कहा था कि 'घर पर मैं इसे पहले ही बहुत डांट देता हूं, अब आप लोग इसे सेट पर मत डांटिए.' सुनील दत्त का जन्म 6 जून 1929 को पंजाब के झेलम जिले के खुर्द गांव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है. बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया था, जिससे उनका बचपन कठिनाइयों से भरा रहा.
कंडक्टर की नौकरी
1947 के विभाजन के समय सुनील दत्त ने अपने परिवार के साथ भारत आने का दर्दनाक सफर देखा. उन्होंने कभी बस कंडक्टर की नौकरी की, तो कभी छोटी-मोटी नौकरियों से घर चलाया. पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने मेहनत जारी रखी और धीरे-धीरे रेडियो में काम करने लगे. यहीं से उनकी आवाज और व्यक्तित्व को पहचान मिली. इसके बाद उन्होंने फिल्मों की ओर कदम बढ़ाया और 1955 में फिल्म 'रेलवे प्लेटफॉर्म' से शुरुआत की.
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नरगिस से प्यार
1957 में आई फिल्म 'मदर इंडिया' ने उन्हें स्टार बना दिया. इस फिल्म में उन्होंने एक गुस्सैल बेटे 'बिरजू' का किरदार निभाया, जो आज भी याद किया जाता है. इसी फिल्म के दौरान उनकी मुलाकात अभिनेत्री नरगिस से हुई और आगे चलकर यही रिश्ता शादी में बदल गया. दोनों के तीन बच्चे हुए संजय दत्त, प्रिया दत्त और नम्रता दत्त. अपने करियर में उन्होंने कई सुपरहिट फिल्में दीं, लेकिन उन्होंने उतार-चढ़ाव भी देखे. फिल्म 'रेशमा और शेरा' की असफलता के बाद वे कर्ज में डूब गए थे, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. धीरे-धीरे उन्होंने फिर वापसी की और अपनी मेहनत से एक बार फिर पहचान बनाई.
संजय दत्त के बदल देते थे डायलॉग
उनका अपने बेटे संजय दत्त के साथ रिश्ता बेहद खास था. फिल्म 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' में जब दोनों साथ आए, तो यह दर्शकों के लिए एक भावनात्मक जुड़ाव बन गया. कहा जाता है कि सुनील दत्त शूटिंग के दौरान जानबूझकर संजय के डायलॉग बदल देते थे ताकि वह हर सीन में नया अंदाज सीखें. इस पर संजय मजाक में कहते थे कि 'पापा के साथ शूटिंग मतलब हर टेक में नया एग्जाम.'
वहीं, जब किसी सीन को लेकर डायरेक्टर संजय को फटकार लगा देते थे, तो वह कहते थे कि 'घर पर मैं इसे पहले ही बहुत डांट देता हूं, अब आप लोग इसे सेट पर मत डांटिए.' सुनील दत्त राजनीति में भी सक्रिय रहे और कई बार सांसद चुने गए. 2005 में उनका निधन हो गया, लेकिन वह अपने काम और व्यक्तित्व के जरिए लोगों के दिलों में आज भी जिंदा हैं.