पुरुष वो है जिसमें नैतिक मूल्य हों. ईमानदारी, जिम्मेदारी हो, जिसका अपनी भावनाओं पर नियंत्रण हो. जो महिलाओं का आदर करे, समाज की भलाई के लिए काम करे. भारतीय मान्यता में 64 कला निपुण पुरुष का वर्णन है. मान्यता है कि सिर्फ कृष्ण ही 64 कला निपुण हुए. तो जरा सोचिए जो पुरुषोत्तम है वो कैसा होगा? श्रीराम जैसा. अद्भुत, अद्वितीय. तो किसी से अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है वो राम सा होगा. लेकिन जब कोई कलाकार प्रभु राम की भूमिका निभा रहा हो तो उम्मीद रहती है कि उनके व्यक्तित्व की एक झलक जरूर दिखा जाएगा. सागर ना सही, एक बूंद. पर्वत ना सही, उसका एक कण. मैंने रामायणम् का टीजर दिखा. रणबीर कपूर सबसे कमजोर कड़ी लगे. अच्छा ग्राफिक्स है. एनिमेशन है. पुष्पक विमान गजब है. लेकिन जिसे फिल्म का केंद्र होना है, वही कमजोर है.
श्रीराम की भूमिका निभाने वालों को, श्रीराम की कहानी दिखाने वालों को पहले श्रीराम को समझना होगा. श्रीराम कोई एक्शन हीरो नहीं हैं. श्रीराम कोई कतरा नहीं हैं. पूरे हैं. कोई चाह ले, प्रयास कर ले तो उनकी छाया नहीं आएगी. उसके लिए चाहिए श्रद्धा. उसके लिए चाहिए वो अहसास. तभी इस भूमिका को निभा पाएगा.
राम जीवन के सार हैं. हममें जो भी अच्छा है वो हैं राम. दृढ़ हैं राम-मुलायम हैं राम. प्रचंड हैं राम-सौम्य हैं राम. गंभीर हैं राम-निर्मल हैं राम. रौद्र हैं राम-करुणा हैं राम. राम भोले हैं, सरल हैं. राम ऐसे हैं जिन्हें देखकर जोश से ज्यादा ऊर्जा आती है. राम ऐसे हैं जिन्हें देख कर लगता है, देखते रहें. आंखों से आंसू निकल आते हैं. इसके पीछे भक्ति है, प्रेम है, आदर है और कुछ ऐसा है, जो व्याख्या से परे है. वाल्मिकि के अपने राम, तुलसी के अपने. कंबन के अपने राम.
तुलसी दास ने लिखा तो है-
जाकी रही भावना जैसी . प्रभु मूरति देखी तिन तैसी .
देखहिं रूप महा रनधीरा . मनहुं बीर रसु धरें सरीरा .
ऐसे में सचमुच किसी कलाकार का ये किरदार उम्मीद के मुताबिक निभा जाना बड़ी चुनौती है. फिर राम का नाम जिस तरह से आज युद्ध उद्घोष बन गया है, उससे भी असमंजस पैदा हो सकता है. दूसरा, रामानंद सागर के राम की छवि कुछ ऐसी बसी है कि कोई भी ये किरदार निभाए अरुण गोविल से तुलना होने लगती है. उस लकीर को छोटा करना वाकई बड़ी चुनौती है.
रणबीर कपूर गजब के कलाकार हैं, स्टार हैं. रॉकस्टार से लेकर बर्फी तक हमने रणबीर का कमाल देखा है. लेकिन राम की भूमिका के लिए रणबीर को रणबीर के स्टारडम से बाहर आना होगा. राम को महसूस करना होगा. बाकी टीजर में जिस तरह का स्केल दिख रहा है वो अच्छा लग रहा है. हमारे पास ट्रॉय और 300 से बड़ी फिल्मों की गाथा पड़ी हैं, गाथा क्या कहिए पूरी पटकथा रेडिमेड है. बस उसे स्केल देने वाला चाहिए. इस लिहाज से टीजर उम्मीद जगा रहा है.
विजुअल इफेक्ट के लिए आठ ऑस्कर जीत चुके DNEG का असर टीजर में दिख रहा है. लेकिन ये तकनीक, ये एनिमेशन महज साधन हैं. आप कहना क्या चाहते हैं, क्योंकि हर शॉट अपने आप में कुछ कहता है, एक सामानांतर कहानी. जैसे रथ का पहिया सुंदर है, उस युग और हमने जो सुना-पढ़ा है, उसके अनुरूप है. नीतेश तिवारी के ज्यादातर लॉन्ग शॉट ग्रैंड हैं, मनमोहक हैं लेकिन कैमरा करीब आता है तो बिखरता है.
राम तो करीब के हैं. सबके हैं. क्लोज हैं. क्लोजअप में कमाल होना चाहिए. कहीं एक बड़ी फिल्म की कमजोर कड़ी ना बन जाएं नीतेश के राम? लेकिन अभी निर्णय नहीं दे सकते हैं. हमें 'दंगल' दिखा चुके नीतेश ने इस फिल्म में जाने क्या छिपा रखा हो. ये तो ट्रेलर है, पिक्चर अभी बाकी हो सकती है.
शुभकामनाएं!