"हीरो हवा में उड़ता रहता है...काटता रहता है, धुरंधर 2 के बाद ऐसी फिल्म आएगी तो उसका क्या हाल होगा?" पढ़ें ऐसा क्यों बोल गए राम गोपाल वर्मा?

राम गोपाल वर्मा लंबे समय से आदित्य धर के डायरेक्शन में बनी धुरंधर 2 की तारीफ कर रहे हैं. इस बीच एनडीटीवी ने उनके साथ एक खास बातचीत की और फिल्म को लेकर उनका विजन समझने की कोशिश की.

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राम गोपाल वर्मा ने फिल्म मेकिंग में बदलाव पर की बात
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नई दिल्ली:

डायरेक्टर राम गोपाल वर्मा से एनडीटीवी की एक्सक्लूसिव बातचीत, पढ़ें धुरंधर 2 और साउथ के सिनेमा पर क्या क्या बोले मशहूर डायरेक्टर.

सवाल - आपने अपने ट्वीट में एक और चीज कही, जो सीधे साउथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री की तरफ इशारा करती है. आपने कहा कि जब फाइट होती है तो एक्टर बॉल की तरह हवा में उछलते हैं, लाउड बैकग्राउंड स्कोर के साथ. लेकिन उस तरह का सिनेमा लोगों ने पसंद किया. चाहे हम बात करें आरआरआर या राजामौली की फिल्मों की, पुष्पा की उन फिल्मों ने अच्छा-खासा पैसा भी कमाया और लोगों को पसंद भी आईं. जी, तो क्या आपको लगता है कि बहुत सारे फिल्ममेकर्स आपके इन ट्वीट्स से आपसे नाराज हो जाएंगे?

जवाब - सी, आई मीन, आई डोंट नो अबाउट दैट, लेकिन अंदर ही अंदर जो मेरी पर्सनल बातें लोगों से होती थीं, ऑल ऑफ देम आर एक्नॉलेजिंग धुरंधर इज समथिंग एल्स, एंड दे आर ऑल स्केयर्ड ऑल्सो. वो जो टेम्पलेट के साथ जो भी फिल्में चल रही थीं, यू नो, उनका टाइम खत्म हो गया है. इस व्हाट इवन दे आर थिंकिंग. दे आर ऑल वांटिंग टू चेंज, बट चेंज इज वेरी डिफिकल्ट. जैसे मैंने कहा कि अगर ऑर्गेनिक नहीं है, तो चेंज कैसे करेंगे? तो धुरंधर के बारे में, जैसे मैंने बताया अगर क्लाइमैक्स के बाद चालीस मिनट पिक्चर चल रही है, तो उससे आप क्या सीखेंगे? व्हाट विल यू लर्न? क्या आप जानबूझकर ऐसा करेंगे और क्लाइमैक्स का जो मतलब है, उसे खत्म कर देंगे? आदित्य ने बिना क्लाइमैक्स के क्लाइमैक्स वाली फिल्म क्या होती है आई डोंट थिंक एनीबडी थॉट अबाउट इट, राइट.

वो एक मैसिव डिसरप्शन है. दूसरा पॉइंट यह है कि एक बड़ी हिट फिल्म वन ऑफ द बिगेस्ट हिट्स बिफोर धुरंधर उसमें हीरो हवा में उड़ता रहता है, काटता रहता है, हाथ पीछे रखकर. अब वैसी फाइट अगर धुरंधर के बाद किसी फिल्म में आएगी, तो उसका क्या हाल होगा? इट्स अ वेरी इंटरेस्टिंग ऑब्जर्वेशन.

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सवाल - आप पुष्पा की बात कर रहे हैं?

जवाब - हां, इसलिए कि बेंचमार्क बदल गए हैं. बेंचमार्क, धुरंधर से पहले साउथ इंडियन कमर्शियल फिल्में थीं. यूफोरिक फाइट्स, हीरो एलिवेशन और जो भी हम कहते हैं, आइटम सॉन्ग्स वगैरह. अब बेंचमार्क धुरंधर है. अभी बेंचमार्क धुरंधर है. अच्छा, दूसरा पॉइंट है ऐसा नहीं है कि लोग पसंद नहीं कर रहे हैं, हो सकता है करें, लेकिन इम्पैक्ट कलेक्शंस से अलग होता है. धुरंधर ने ऑडियंस का माइंडसेट बदल दिया. मैं जियो प्लाजा में इसे तीसरी बार देख रहा था.

सवाल - ओह, आपने फिल्म तीन बार देखी?

जवाब - जी. पच्चीस मिनट ट्रेलर और ऐड्स चल रहे थे, और पंद्रह-बीस मिनट इंटरवल—तो कुल मिलाकर चार घंटे चालीस मिनट देखने के बाद भी, एंड टाइटल्स में लोग उठे नहीं. दैट आई डोंट थिंक आई हैव सीन एनीथिंग लाइक दैट बिफोर.

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सवाल - एक चीज मैं आपसे पूछना चाहूंगा क्या लोग आपसे नाराज हो रहे हैं? आपने सोशल मीडिया पर जो लिखा, उस पर किसी ने मैसेज या फोन किया कि आप ये सब क्या बोल रहे हैं?

जवाब - नाराज सही शब्द नहीं है, लेकिन उन्हें यह पसंद नहीं आएगा, क्योंकि वो सब लोग मिलकर तिरुपति और वैष्णो देवी मंदिर जाएंगे कि उनकी तरह की कोई फिल्म आकर धुरंधर का रिकॉर्ड तोड़ दे. अब उनके पास वही एक सहारा बचा है योर सेवियर थिंग इज ओनली दैट नाउ, इट कैन हैपन. तो मुझे लगता है कि “टॉक्सिक” के लिए सब लोग भगवान की पूजा करेंगे. टॉक्सिक धुरंधर का रिकॉर्ड तोड़ने के लिए. एंड आई एम नॉट सेइंग टॉक्सिक वैसे मेरा मतलब उस तरह के फिल्ममेकिंग स्टाइल से है.

सवाल - लेकिन एक और चीज धुरंधर से पहले जो सिनेमा आया जैसे आरआरआर, पुष्पा, बाहुबली जहां ग्रैविटी को मात देने वाले एक्शन थे. क्या आपको वो पसंद थे? या शुरू से आपको अपनी “शिवा स्टाइल” की फिल्में पसंद थीं?

जवाब - आई नेवर लाइक्ड दैट काइंड ऑफ सिनेमा. आई थिंक इट वर्क्स ऑन स्पेक्टेकल फॉर सम फैन-बेस्ड ऑडियंस. आखिरकार लोग वही देखते हैं जो उनकी पसंद होती है. अगर उनकी पसंद में एक बोरिंग फिल्म है जिसमें ग्रैविटी-डिफाइंग फाइट्स हैं, तो ठीक है आप ताली मारेंगे. लेकिन धुरंधर में आप देखिए कोई ताली नहीं बजाता, क्योंकि लोग स्टोरीटेलिंग में पूरी तरह डूबे हुए हैं.

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सवाल - आजकल देशभक्ति से भरपूर सिनेमा चल रहा है “नया भारत” जहां घर में घुसकर मारता है ऐसे डायलॉग्स पर तालियां बजती हैं. क्या फिल्म की कामयाबी के पीछे यह भी एक वजह है?

जवाब - सी, आई पर्सनली डोंट बिलीव कि फिल्में सिर्फ थीम्स पर काम करती हैं. थीम और फिल्म की मेकिंग अलग चीजें हैं. इस फिल्म में एक स्पाई है, तो उसमें अपने आप पैट्रियोटिज्म आ जाता है, लेकिन उसे ओवरडू नहीं किया गया. ऐसा नहीं है कि रणवीर सिंह सनी देओल की तरह चिल्ला रहा है. कोई ड्रामाटिज्म नहीं है. वो एक ऐसे इंसान की तरह लगता है जो सिचुएशन में फंसा हुआ है. पूरी फिल्म में एक बार भी “मैं देश के लिए करूं” जैसा डायलॉग नहीं है. सब लोग अपने-अपने काम और परिस्थितियों में हैं. वही रियलिज्म काम करता है. मैं नहीं मानता कि फिल्म की सफलता सिर्फ पैट्रियोटिज्म की वजह से है. देखिए, ‘गदर 2' आई एम नॉट अ पैट्रियट, बट मैंने वह फिल्म तीन बार देखी.

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सवाल - इस फिल्म में आपका फेवरेट कैरेक्टर कौन सा है?

जवाब - रणवीर सिंह एक्स्ट्राऑर्डिनरी हैं, और उनके हिसाब से कोई कम नहीं है. मुझे लगता है कि हर कैरेक्टर अच्छा है कोई भी इससे बेहतर नहीं कर सकता था, चाहे रोल छोटा ही क्यों न हो.

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