कभी-कभी फिल्मी दुनिया में एक ऐसी कहानी सामने आती है, जो सुनने में किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं लगती. एक तरफ एक सुपरहिट फिल्म, दूसरी तरफ उसी फिल्म से जुड़ा ऐसा कनेक्शन, जो सालों बाद टीवी की दुनिया में इतिहास रच देता है. दिलचस्प बात ये है कि ये कहानी सिर्फ स्टारडम या कमाई की नहीं, बल्कि एक ऐसे सपने की भी है, जिसने हिंदी सिनेमा को आरके स्टूडियो जैसा बड़ा नाम दिया. अब जरा सोचिए आखिर वो कौन सी फिल्म थी, जिसने राज कपूर का सपना पूरा किया और उन्हें अपना आरके स्टूडियो खड़ा करने का मौका दिया, साथ ही एक ऐसा सफर शुरू किया जो सिनेमा से निकलकर ‘रामायण' तक जा पहुंचा.
नाम सुनते ही समझ आएगा कनेक्शन
राज कपूर ने 22 साल की उम्र में ‘आग' बनाई लेकिन फिल्म उम्मीद के मुताबिक नहीं चली. आग के बाद राज कपूर के सामने खुद को साबित करने की बड़ी चुनौती थी. पहली फिल्म की नाकामी ने उन्हें झकझोर जरूर दिया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. उन्हें समझ आ गया था कि अब एक ऐसी कहानी चाहिए जो सीधे दर्शकों के दिल में उतर जाए. इसी तलाश ने उन्हें सही लोगों तक पहुंचाया और यहीं से उनकी नई शुरुआत हुई.
एक नाम, बड़ा कनेक्शन
इस मोड़ पर उनके पिता पृथ्वीराज कपूर ने नए राइटर रामानंद सागर का नाम सुझाया. उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही नाम आगे चलकर ‘रामायण' जैसा इतिहास रचेगा. ‘बरसात' उनकी पहली बड़ी फिल्म बनी और उनकी कहानी ने राज कपूर की किस्मत बदल दी. यहीं से सिनेमा और टीवी के बीच एक अनोखा रिश्ता भी जुड़ गया.
कमाई से बना सपना
बरसात' के गाने उस दौर में सुपरहिट रहे. कहा जाता है कि म्यूजिक की रॉयल्टी से ही फिल्म की लागत निकल आई थी. इसके बाद थिएटर में फिल्म ने शानदार कमाई की और राज कपूर आर्थिक रूप से मजबूत हो गए. फिल्म की कमाई से राज कपूर ने चेंबूर में करीब 2.2 एकड़ जमीन खरीदी. उस वक्त ये इलाका काफी शांत था, लेकिन शूटिंग के लिए बेहतरीन माना जाता था. इसी जमीन पर आगे चलकर आरके स्टूडियो बना.