मुंबई में आयोजित फ्रेंच आईपी मार्केट में भारत और फ्रांस की फिल्म इंडस्ट्री के बीच कहानियों के आदान-प्रदान और सहयोग पर खुलकर बातचीत हुई. इस मंच का मकसद फ्रांस की कहानियों और बौद्धिक संपदा को भारतीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई निर्माताओं तक पहुंचाना है, ताकि उन्हें स्थानीय दर्शकों के मुताबिक नए रूप में ढाला जा सके. यह कार्यक्रम फ्रेंच इंस्टीट्यूट इन इंडिया की पहल पर मुंबई के जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में आयोजित किया गया. यहां फिल्म निर्देशक, निर्माता, लेखक और दूसरे रचनात्मक पेशेवर इकट्ठा हुए और रूपांतरण, रीमेक और सह-निर्माण की संभावनाओं पर चर्चा की.
इस मौके पर फिल्म निर्देशक श्रीराम राघवन ने कहा कि भारत में कहानियों की कोई कमी नहीं है, लेकिन उन्हें अच्छी तरह लिखने और तैयार करने में समय लगता है. उन्होंने कहा, “हमारे यहाँ बहुत सारी खूबसूरत कहानियां हैं, लेकिन अच्छी कहानी लिखने में वक्त लगता है. लेखक को समय चाहिए होता है और कई बार निर्माता इतने धैर्य से इंतज़ार नहीं करना चाहते. इसलिए कभी-कभी वे पहले से मौजूद कहानियों की तरफ चले जाते हैं. फ्रांस में भी बहुत समृद्ध साहित्य और सिनेमा है, इसलिए वहां से भी प्रेरणा मिलती है.”
राघवन के मुताबिक आज के समय में दर्शकों के पास दुनिया भर का कंटेंट देखने की सुविधा है. “अब लगभग हर फिल्म या कार्यक्रम किसी न किसी ओटीटी मंच पर आ जाता है. लोग अलग-अलग भाषाओं की मूल फिल्में भी देख पा रहे हैं. ऐसे में संभव है कि आने वाले समय में रीमेक कुछ कम हो जाएं.” मलयालम फिल्म इंडस्ट्री की निर्माता अवंतिका रंजीत का मानना है कि रूपांतरण को रचनात्मकता की कमी के रूप में नहीं देखना चाहिए.
उन्होंने कहा,“मुझे लगता है कि आज भी बहुत मजबूत और मौलिक कहानियां बन रही हैं. कई बार हमारी अपनी कहानियां ही आगे चलकर दूसरी भाषाओं में रीमेक या रूपांतरण बन जाती हैं.” फिल्म निर्माता सुजाता का कहना है कि रीमेक दरअसल रचनात्मक आदान-प्रदान का हिस्सा हैं. उन्होंने कहा, “कई भावनाएं और विचार पहले से मौजूद होते हैं. असली रचनात्मकता इस बात में है कि आप उस विचार को लेकर अपनी संस्कृति और अपने दर्शकों के हिसाब से उसे नया रूप दें.”
उनके मुताबिक आज के दौर में किसी की कहानी की सीधी नकल करना आसान नहीं है, क्योंकि दर्शक दुनिया भर की फिल्में देख रहे हैं और तुरंत पहचान लेते हैं कि कहानी कहां से आई है.