'खाते में थे सिर्फ 84 रुपये, बैंक को देखकर टेकते थे माथा', धुरंधर एक्टर का कामयाबी से पहले का संघर्ष

धुरंधर के एक्टर गौरव गेरा ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया कि एक समय उनके बैंक खाते में सिर्फ 84 रुपये थे. फैशन डिजाइनिंग से थिएटर तक का उनका सफर कई चुनौतियों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी.

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धुरंधर के एक्टर ने बताया क्यों बैंक के सामने टेकते थे माथा
नई दिल्ली:

धुरंधर में अपनी एक्टिंग से दर्शकों को कभी जोश दिलाने वाले और कभी उनकी आंखें नम करने वाले गौरव गेरा को आज कौन नहीं जानता. धुरंधर से पहले तक वे लाखों लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाले कलाकार के तौर पर जानते थे. लेकिन उनकी जिंदगी का एक दौर ऐसा भी था जब जेब लगभग खाली थी और सपने उम्मीद के सहारे आगे बढ़ रहे थे. मुंबई जैसे शहर में अपनी पहचान बनाने निकले गौरव गेरा ने वो दिन भी देखे जब उनके बैंक खाते में सिर्फ 84 रुपये बचे थे. फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. हाल ही में उन्होंने अपने संघर्ष, परिवार के सपोर्ट और सफलता के बाद खुद को जमीन से जुड़े रखने की कहानी साझा की, जो किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं लगती.

फिल्मों से नहीं था कोई नाता

गौरव गेरा ने यूट्यूब चैनल जिस्ट को बताया कि उनके परिवार का फिल्मों या मनोरंजन की दुनिया से कोई लेना-देना नहीं था. बचपन में स्कूल के फंक्शन और फैंसी ड्रेस प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हुए उन्हें एक्टिंग और परफॉर्मेंस का शौक लगा. हालांकि पढ़ाई में भी वे अच्छे थे और हमेशा अच्छे नंबर लाते थे. लेकिन दिल कहीं न कहीं कला की दुनिया में ही लगता था.

फैशन डिजाइनिंग से थिएटर तक पहुंची मंजिल

अपने हुनर को करियर बनाने की सोच के साथ गौरव ने फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई शुरू की. उन्हें लगा था कि यही उनका भविष्य है, लेकिन कुछ समय बाद एहसास हुआ कि उनका मन इस क्षेत्र में नहीं है. उन्होंने कोर्स पूरा किया, कुछ समय नौकरी की और फिर थिएटर का रुख कर लिया. यही फैसला उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ.

जब खाते में सिर्फ 84 रुपये बचे थे

मुंबई में संघर्ष के दौरान आर्थिक हालात कई बार बेहद मुश्किल हो गए. गौरव ने याद करते हुए बताया कि एक समय उनके बैंक खाते में सिर्फ 84 रुपये थे. वे रोज एचडीएफसी बैंक के सामने से गुजरते थे और मजाक-मजाक में बैंक से कहते थे, 'मेरा ख्याल रखना.' इतना ही नहीं, वे बैंक को देखकर माथा भी टेकते थे. उनके पिता नौकरीपेशा थे और जितनी मदद कर सकते थे, करते थे, लेकिन संसाधन सीमित थे. इसके बावजूद गौरव ने कभी खुद को बेबस नहीं माना.

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एक चिट्ठी जो आज भी देती है हौसला

गौरव ने उस चिट्ठी का भी जिक्र किया जो उन्होंने मुंबई आने के कुछ समय बाद घर भेजी थी. उसमें उन्होंने लिखा था कि अभी कुछ बड़ा हासिल नहीं हुआ है, लेकिन उन पर भरोसा बनाए रखें क्योंकि भविष्य बेहतर होगा. आज भी जब वे उस चिट्ठी को याद करते हैं तो उसे अपनी सोच और आत्मविश्वास की सबसे बड़ी ताकत मानते हैं.

सफलता मिली, लेकिन नहीं बदला स्वभाव

धुरंधर और धुरंधर: द रिवेंज की सफलता के बाद गौरव को खूब प्यार मिल रहा है. लेकिन उनका कहना है कि सफलता के साथ अहंकार नहीं आना चाहिए. वे मानते हैं कि मनोरंजन की दुनिया हर इंसान को विनम्र रहना सिखाती है. शायद यही वजह है कि संघर्ष के दिनों को याद रखने वाले गौरव आज भी खुद को लगातार जमीन से जुड़ा रखने की कोशिश करते हैं.

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