धुरंधर 2 जब से रिलीज हुई है कुछ लोग इसे प्रोपेगेंडा फिल्म बता रहे हैं तो वहीं कुछ लोग इसकी जमकर तारीफ कर रहे हैं. वहीं एक फिल्म मेकर ऐसे भी हैं जो काफी समय से फिल्म की तारीफों के पुल बांध रहे हैं और इसे मास्टरपीस बता रहे हैं. इनका नाम है राम गोपाल वर्मा. फिल्म को लेकर इनकी सोच को समझने के लिए एनडीटीवी ने उनसे खास बातचीत की. इसमें उन्होंने कई सवालों के जवाब दिए.
राम गोपाल वर्मा से सवाल - लोग फिल्म दो तरह से देख रहे हैं. एक इसका पूरा जियो पॉलिटिक्स या पॉलिटिक्स है और दूसरी तरफ जो शुद्ध फिल्म के बारे में हम बात करते हैं भव्यता,टेकिंग, मेकिंग. अगर मैं आपसे पूछूं कि जो लोग सवाल उठा रहे हैं फिल्म में जो पॉलिटिक्स है उसके ऊपर, आप उसमें कहां तक सहमत हैं या कितना?
जवाब - हां, देखिए जो लोग बोल रहे हैं कि यह प्रोपेगेंडा फिल्म है, रिसर्च के लिए बात कर रहे हैं? नहीं, नहीं, मेरा पॉइंट है प्रोपेगेंडा का मतलब क्या है? हर एक का एक दृष्टिकोण होता है. हम दोनों अगर बात कर रहे हैं तो मैं अपना पॉइंट आगे बढ़ाने की कोशिश करता हूं, आप भी वही करते हैं, सब लोग वही करते हैं. तो अगर आदित्य का कोई विश्वास है, रिसर्च का मतलब है कि उसके अपने कुछ स्रोत होंगे, मेरे कुछ अलग होंगे, आपके कुछ अलग होंगे, सभी के अलग होंगे. ऐसा नहीं है कि जो हादसे हो रहे थे, आदित्य ने खुद देखा हो. अगर किसी ने उसे बताया, तो वह शायद झूठ भी बोल सकता है. लेकिन बात यह है कि हम सब किसी न किसी बिंदु पर किसी पर विश्वास करते हैं. विश्वास का यह मतलब नहीं कि वह सौ प्रतिशत सच है. आज की दुनिया में सौ प्रतिशत सच का कोई निश्चित मतलब नहीं है. तो हर व्यक्ति वही मानता है जो वह मानना चाहता है. इसमें निर्देशक की काबिलियत यह है कि वह उसे भरोसेमंद बना दे.
ठीक है, तो अगर कोई सहमत नहीं करता है — कि जो आदित्य दिखा रहा है वह गलत है, सच नहीं है तो उन्हें अपनी फिल्म बनाने दीजिए.
सवाल - लेकिन एक फिल्म निर्माता के तौर पर, आप क्या सोचते हैं? क्या आप विश्वास करते हैं जो जियो पॉलिटिक्स दिखाया गया है वो सही है या जो आप फिल्म की तारीफ करते हैं वो आप केवल फिल्म मेकिंग की बात कर रहे हैं उसमें सिखाई गई जियोपोलिटिक्स की नहीं ?
जवाब- हो सकता है कि मैं कुछ बातों पर विश्वास न करूं, सिर्फ इसलिए क्योंकि मेरे सोर्स अलग हैं. इसका मतलब यह नहीं कि मेरे सोर्स ही सही हैं. ठीक है. हम सब लोग अपने विश्वासों में अलग हैं. हर एक का अनुभव, उसकी जानकारी, उसकी समझ सब अलग होती है. इसलिए हम सब सहमत नहीं होंगे. अगर हम हर बात पर सहमत हो जाएं, तो फिर बातचीत की जरूरत ही क्या है? तो आदित्य ने वही दिखाया है, जिस पर वह विश्वास करता है. अगर मैं उस पर विश्वास नहीं करता और मुझे लगता है कि यह झूठ है जो बताया जा रहा है, तो मुझे दूसरी फिल्म बनानी चाहिए. अगर मेरे पास आदित्य धर जैसी क्षमता है और उसे गलत साबित करना चाहिए.