67 बार हुआ झाड़-फूंक, अंदर थे 6 शैतान, 10 महीनों तक चला एक्सॉर्सिज्म...क्या थी एमिली रोज की असली कहानी?

हॉलीवुड की कई हॉरर फिल्मों को लोग सिर्फ कल्पना मानते हैं, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी भी हैं जिनकी जड़ें असली घटनाओं से जुड़ी होती हैं. ‘द एक्सॉर्सिज्म ऑफ एमिली रोज' भी उन्हीं फिल्मों में से एक है.

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इस रियल केस पर बनी थी ‘द एक्सोर्सिज्म ऑफ एमिली रोज’

हॉलीवुड की कई हॉरर फिल्मों को लोग सिर्फ कल्पना मानते हैं, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी भी हैं जिनकी जड़ें असली घटनाओं से जुड़ी होती हैं. ‘द एक्सॉर्सिज्म ऑफ एमिली रोज' भी उन्हीं फिल्मों में से एक है. इस फिल्म के पीछे जर्मनी की एक लड़की एनेलीज मिशेल की ऐसी कहानी छिपी है, जिसने दशकों तक लोगों को डराया भी और सोचने पर मजबूर भी किया. सवाल सिर्फ इतना नहीं था कि एक लड़की की मौत कैसे हुई, बल्कि यह भी था कि क्या वह किसी मानसिक बीमारी से जूझ रही थी या सच में उसे किसी बुरी ताकत का असर मान लिया गया था.

एनेलीज मिशेल का जन्म साल 1952 में जर्मनी के एक धार्मिक ईसाई परिवार में हुआ था. 16 साल की उम्र के बाद उन्हें अजीब दौरे पड़ने लगे और उनका व्यवहार बदलने लगा. कई बार वे डरावनी आवाजें सुनने और अजीब चीजें महसूस करने की बात करती थीं. शुरुआत में डॉक्टरों ने उन्हें एपिलेप्सी यानी मिर्गी और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दिक्कतों से पीड़ित बताया था.

डॉक्टरी इलाज छोड़कर झाड़-फूंक में जुटा परिवार

जांच के बाद डॉक्टरों ने एनेलीज को एपिलेप्सी यानी मिर्गी से जुड़ी गंभीर बीमारी से पीड़ित बताया. इलाज और दवाइयां शुरू हुईं, लेकिन परिवार को उम्मीद के मुताबिक सुधार नजर नहीं आया. धीरे-धीरे उनके घरवालों का भरोसा मेडिकल ट्रीटमेंट से हटने लगा और उन्हें लगने लगा कि एनेलीज किसी शैतानी ताकत के असर में हैं. चूंकि ये परिवार बेहद धार्मिक था, उन्होंने इस संबंध में चर्च के पादरियों से संपर्क किया. इसके बाद एनेलीज पर एक्सॉर्सिज्म यानी झाड़-फूंक की प्रक्रिया शुरू हुई. सितंबर 1975 से जुलाई 1976 तक करीब 10 महीनों में उन पर 67 बार झाड़-फूंक के प्रयोग किए गए. इस दौरान उनकी शारीरिक हालत लगातार बिगड़ती गई. उन्होंने खाना-पीना लगभग छोड़ दिया था, जिससे उनका शरीर बेहद कमजोर हो गया.

आज भी मौजूद है झाड-फूंक के वो ऑडियो टेप्स

इस केस को दुनियाभर में चर्चित बनाने में उन ऑडियो रिकॉर्डिंग्स का बड़ा रोल माना जाता है, जिनमें एनेलीज बेहद भारी और डरावनी आवाज में बोलती सुनाई देती हैं. उन रिकॉर्डिंग्स में दावा किया गया कि उनके अंदर 6 शैतानों की आत्माएं हैं, जिनमें ‘लूसिफर', ‘कैन', ‘जूडस इस्कैरियट', ‘एडोल्फ हिटलर', ‘नीरो' और ‘फ्लेशमैन' के नाम शामिल थे, हालांकि वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने इन दावों को कभी स्वीकार नहीं किया.

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जब इस केस पर बनी हॉलीवुड फिल्म

जब 2005 में ‘द एक्सॉर्सिज्म ऑफ एमिली रोज' रिलीज हुई, तो यह केस एक बार फिर दुनियाभर में चर्चा में आ गया. फिल्म में एनेलीज का नाम बदलकर एमिली रोज रखा गया था. खास बात यह थी कि फिल्म सिर्फ हॉरर तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें कोर्टरूम और धार्मिक बहस का एंगल भी दिखाया गया था. यही वजह रही कि यह फिल्म बाकी हॉरर फिल्मों से अलग नजर आई.

कोर्ट का क्या रोल था इस मामले में?

एनेलीज की मौत के बाद जर्मनी में उनके माता-पिता और पादरियों पर मुकदमा चला. अदालत ने इस मामले में भूत-प्रेत जैसी बातों को नहीं माना और इसे लापरवाही से हुई मौत करार दिया. कोर्ट का मानना था कि अगर समय पर मेडिकल इलाज जारी रखा जाता, तो शायद उनकी जान बचाई जा सकती थी. कैथोलिक चर्च को भी अपने नियमों में बदलाव करना पड़ा. इसके बाद यह साफ किया गया कि किसी भी एक्सॉर्सिज्म प्रक्रिया से पहले मेडिकल जांच जरूरी होगी, ताकि मानसिक या न्यूरोलॉजिकल बीमारी को नजरअंदाज न किया जाए.

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जाहिर है कि ये एक ऐसा मामला था जिसमें एक फिल्म बनाने की पूरी संभावनाएं थी. यही वजह कि आज भी ‘द एक्सॉर्सिज्म ऑफ एमिली रोज' को हॉलीवुड की सबसे चर्चित हॉरर फिल्मों में गिना जाता है. लेकिन फिल्म खत्म होने के बाद भी लोगों के मन में वही सवाल रह जाता है कि क्या एनेलीज मिशेल किसी मानसिक बीमारी से जूझ रही थीं या फिर सच में इस कहानी में कुछ ऐसा था, जिसे विज्ञान आज तक पूरी तरह समझ नहीं पाया.

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