ग्रुप स्तर पर लगातार दो मुकाबले हारने के बाद भारतीय हॉकी टीम का लंदन ओलिंपिक का सफर मुश्किल हो गया है। पदक की दौड़ में बने रहने के लिए अब उसे अपने तीनों मुकाबले जीतने होंगे।
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लंदन:
ग्रुप स्तर पर लगातार दो मुकाबले हारने के बाद भारतीय हॉकी टीम का लंदन ओलिंपिक का सफर मुश्किल हो गया है। पदक की दौड़ में बने रहने के लिए अब उसे अपने तीनों मुकाबले जीतने होंगे।
शुक्रवार को ग्रुप (बी) में भारत का सामना पूर्व चैम्पियन जर्मनी के साथ होना है। भारत अभी पदक की दौड़ से बाहर नहीं हुआ है लेकिन आगे के मैचों में एक भी हार या ड्रॉ उसे इस दौड़ से बाहर कर सकती है।
दूसरी ओर, जर्मनी की टीम दो जीत के साथ बेहतर स्थिति में दिख रही है। उसके खाते में छह अंक हैं। 1968 के मैक्सिको ओलिंपिक के बाद से जर्मनी की टीम भारत से नहीं हारी है।
इस ओलिंपिक में हालांकि उसका प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा है। उसने बेल्जियम को 2-1 से और कोरिया को 1-0 से हराया है।
जर्मन टीम टूर्मामेंट के आगे बढ़ने के साथ-साथ लगातार अच्छा प्रदर्शन करने के लिए जानी जाती है। ऐसे में भारत को इस टीम के खिलाफ बेहद सावधानी से खेलना होगा क्योंकि एक भी चूक उसे नौवें स्वर्ण पदक की दौड़ से बाहर कर देगी।
भारतीय टीम बेशक अपना पहला मैच नीदरलैंड्स (1-2) से हार चुकी है लेकिन इस दौरान उसने प्रभावशाली खेल दिखाया है। दूसरे मैच में हालांकि न्यूजीलैंड के खिलाफ उसकी एक न चली।
भारत ने नई दिल्ली में कमजोर टीमों को हराकर आठ साल के बाद ओलिंपिक में खेलने का हक हासिल किया था। क्वालीफाई में उसके प्रदर्शन के बाद अनापेक्षित ढंग से उससे अपेक्षाएं बढ़ गई थीं।
अब भारत को पदक की दौड़ में बने रहने के लिए न सिर्फ जीत हासिल करनी होगी बल्कि यह जीत बड़े अंतर की भी होनी चाहिए। जर्मनी के खिलाफ भारत को जीत हासिल करने में मुश्किल आ सकती है लेकिन इससे कम कुछ भी उसका काम तमाम कर देगा।
अब तक हुए मुकाबले में भारतीय टीम की कई कमियां सामने आई हैं। रक्षापंक्ति के साथ-साथ फॉरवर्डों में भी गोल करने की क्षमता की कमी देखी गई है।
पेनल्टी कार्नर विशेषज्ञ संदीप सिंह और रामचंद्र रघुनाथ पर जरूरत से ज्यादा आश्रित होना भी भारत के लिए हार का कारण बना है इससे गोल करने की सम्भावनाओं का खिलाड़ी पूरी तरह दोहन नहीं करता है।
जर्मनी के खिलाफ भारतीय टीम को एक लिहाज से अग्नि परीक्षा से गुजरना होगा। जर्मन टीम में जहां प्रतिभाशाली और अनुभवी खिलाड़ी हैं वहीं भारतीय टीम को उन्हें रोकने का प्रयास करना होगा।
शुक्रवार को ग्रुप (बी) में भारत का सामना पूर्व चैम्पियन जर्मनी के साथ होना है। भारत अभी पदक की दौड़ से बाहर नहीं हुआ है लेकिन आगे के मैचों में एक भी हार या ड्रॉ उसे इस दौड़ से बाहर कर सकती है।
दूसरी ओर, जर्मनी की टीम दो जीत के साथ बेहतर स्थिति में दिख रही है। उसके खाते में छह अंक हैं। 1968 के मैक्सिको ओलिंपिक के बाद से जर्मनी की टीम भारत से नहीं हारी है।
इस ओलिंपिक में हालांकि उसका प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा है। उसने बेल्जियम को 2-1 से और कोरिया को 1-0 से हराया है।
जर्मन टीम टूर्मामेंट के आगे बढ़ने के साथ-साथ लगातार अच्छा प्रदर्शन करने के लिए जानी जाती है। ऐसे में भारत को इस टीम के खिलाफ बेहद सावधानी से खेलना होगा क्योंकि एक भी चूक उसे नौवें स्वर्ण पदक की दौड़ से बाहर कर देगी।
भारतीय टीम बेशक अपना पहला मैच नीदरलैंड्स (1-2) से हार चुकी है लेकिन इस दौरान उसने प्रभावशाली खेल दिखाया है। दूसरे मैच में हालांकि न्यूजीलैंड के खिलाफ उसकी एक न चली।
भारत ने नई दिल्ली में कमजोर टीमों को हराकर आठ साल के बाद ओलिंपिक में खेलने का हक हासिल किया था। क्वालीफाई में उसके प्रदर्शन के बाद अनापेक्षित ढंग से उससे अपेक्षाएं बढ़ गई थीं।
अब भारत को पदक की दौड़ में बने रहने के लिए न सिर्फ जीत हासिल करनी होगी बल्कि यह जीत बड़े अंतर की भी होनी चाहिए। जर्मनी के खिलाफ भारत को जीत हासिल करने में मुश्किल आ सकती है लेकिन इससे कम कुछ भी उसका काम तमाम कर देगा।
अब तक हुए मुकाबले में भारतीय टीम की कई कमियां सामने आई हैं। रक्षापंक्ति के साथ-साथ फॉरवर्डों में भी गोल करने की क्षमता की कमी देखी गई है।
पेनल्टी कार्नर विशेषज्ञ संदीप सिंह और रामचंद्र रघुनाथ पर जरूरत से ज्यादा आश्रित होना भी भारत के लिए हार का कारण बना है इससे गोल करने की सम्भावनाओं का खिलाड़ी पूरी तरह दोहन नहीं करता है।
जर्मनी के खिलाफ भारतीय टीम को एक लिहाज से अग्नि परीक्षा से गुजरना होगा। जर्मन टीम में जहां प्रतिभाशाली और अनुभवी खिलाड़ी हैं वहीं भारतीय टीम को उन्हें रोकने का प्रयास करना होगा।
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