1995 के दशक में बिहार के चुनावों को राजनीतिक उत्सव के रूप में मनाया जाता था, जिसमें लोक गीत और रंगमंच शामिल थे चुनाव प्रचार में लोगों की सक्रिय भागीदारी होती थी, जिसमें नारे, नृत्य और भोज होते थे जो लोकतंत्र की आत्मा थीं वर्तमान में बिहार के चुनावी माहौल में राजनीतिक प्रचार में भारी खामोशी और उत्साह की कमी देखी जा रही है