मोहन भागवत ने कहा कि भारत का चरित्र हिंदू समाज के समावेशी और विविधता स्वीकारने वाले स्वभाव से जुड़ा है आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए कहा कि स्थानीय वस्तुएं खरीदनी चाहिए और विदेशी वस्तुएं केवल आवश्यकता पर लें उन्होंने हिंदुओं में जाति, संप्रदाय, भाषा या व्यवसाय की परवाह किए बिना एकता स्थापित करने का आह्वान किया