- यूरोप इस समय हीटवेव की चपेट में है और मई महीने के तापमान के कई पुराने रिकॉर्ड टूट गए हैं
- यूरोप का औसत तापमान औद्योगिक युग के मुकाबले करीब दो दशमलव चार डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है
- हीट डोम नामक उच्च दबाव प्रणाली के कारण उत्तरी अफ्रीका की गर्म हवा यूरोप पर फंसी हुई है
भारत में इस समय प्रचंड गर्मी है. लोग लू के थपेड़ों से बेहाल हैं. लेकिन यहां से 6 हजार किमी दूर मौजूद यूरोप भी इस हफ्ते रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव की चपेट में है. यह दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है और इसका हिस्सा तेजी से गर्म हो रहे आर्कटिक क्षेत्र तक फैला हुआ है. सोमवार और मंगलवार को ब्रिटेन, आयरलैंड और फ्रांस में मई महीने के तापमान के पुराने रिकॉर्ड टूट गए. फ्रांस में तो कम से कम 7 लोगों की प्रचंड गर्मी की वजह से मौत भी हो चुकी है. डराने वाली बात यह है कि आने वाले दिनों में यूरोप को इससे भी ज्यादा खतरनाक गर्मी का सामना करना पड़ सकता है. सवाल है कि जिस यूरोप में अभी के वक्त में 17-18 डिग्री सेल्सियस का तापमान रहता था, वहां अभी तापमान 40 डिग्री की दहलीज तक कैसे पहुंच चुका है. चलिए आपको वजह बताते हैं.
1- हीट डोम
उत्तरी अफ्रीका से आई गर्म हवा का एक बड़ा हिस्सा, जिसे “हीट डोम” कहा जाता है, पश्चिमी यूरोप के ऊपर बने हाई-प्रेशर सिस्टम के नीचे फंस गया है. इसी वजह से ऐसी गर्मी पड़ रही है, जो आमतौर पर गर्मियों के चरम समय में देखने को मिलती है.
2- ज्यादा तेजी से बढ़ता तापमान
दुनिया का औसत तापमान औद्योगिक युग से पहले यानी सन 1850-1900 के मुकाबले करीब 1.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है. लेकिन यूरोप का तापमान उसी दौर के मुकाबले करीब 2.4 डिग्री ज्यादा बढ़ चुका है. यह जानकारी यूरोपीय संघ की कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस ने दी है. यह अतिरिक्त गर्मी मुख्य रूप से इंसानों द्वारा पैदा किए गए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल की वजह से है.
3- मौसम के पैटर्न में बदलाव
कॉपरनिकस के मुताबिक, वातावरण में बदलाव की वजह से यूरोप में गर्मियों के दौरान हीटवेव ज्यादा बार और ज्यादा खतरनाक हो रही हैं. हाई-प्रेशर सिस्टम साफ मौसम और ज्यादा तापमान लाते हैं, और अब यूरोप में यह पहले से ज्यादा बनने लगे हैं. कॉपरनिकस के डायरेक्टर कार्लो बूनटेम्पो ने कहा कि पिछले 20-30 सालों में खासकर गर्मियों में ऐसे हालात ज्यादा देखने को मिले हैं, जो हीटवेव की संभावना बढ़ाते हैं.
4- तेजी से गर्म होता आर्कटिक
एक बड़ी वजह यूरोप की भौगोलिक स्थिति भी है. यूरोप आर्कटिक से जुड़ा हुआ है और आर्कटिक दुनिया के बाकी हिस्सों से कहीं ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है. कॉपरनिकस के अनुसार, आर्कटिक का तापमान औद्योगिक युग से पहले के मुकाबले 3.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है. इसकी एक वजह “अल्बेडो फीडबैक” नाम की प्रक्रिया है- बर्फ और बर्फीली सतहें सूरज की गर्मी को वापस अंतरिक्ष में भेज देती हैं. लेकिन जब ये पिघलती हैं, तो नीचे की गहरी जमीन और समुद्र सामने आते हैं, जो ज्यादा गर्मी सोखते हैं. जैसे-जैसे समुद्री बर्फ पिघलती है, गर्मी ज्यादा मात्रा में सोखी जाती है. इससे पानी और ज्यादा गर्म होता है और और ज्यादा बर्फ पिघलती है.
5- कम होती बर्फबारी
यूरोप के कई हिस्सों में सर्दियों में बर्फ पड़ने वाले इलाके कम हो गए हैं. कई ऐसे इलाके, जहां पहले एक हफ्ते या उससे ज्यादा समय तक बर्फ पड़ने वाली ठंड पड़ती थी, अब वहां ऐसा नहीं हो रहा. इससे सफेद बर्फ की जगह काली जमीन दिखाई देने लगी है, जो ज्यादा गर्मी सोखती है.
6- घटता वायु प्रदूषण भी वजह
1980 के दशक से सख्त नियमों की वजह से हवा में मौजूद एरोसोल प्रदूषण कम हुआ है. लेकिन इसका एक दूसरा असर भी पड़ा है. ये छोटे-छोटे कण सूरज की रोशनी को परावर्तित करके धरती को थोड़ा ठंडा रखने में मदद करते थे. यह सही है कि वायु प्रदूषण कम होना लोगों की सेहत के लिए बेहद जरूरी है, लेकिन इससे धरती की सतह तक ज्यादा सूरज की गर्मी पहुंच रही है.
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