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UP Politics: यूपी की राजनीति में अभी तो बस 'खेला' शुरू हुआ है, असली 'पिक्चर' अभी बाकी!

उत्तर प्रदेश में अगले साल फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. राज्य की राजनीति में अभी से सरगर्मी दिखने लगी है और सभी दल अपनी-अपनी रणनीति बनाने में जुट गए हैं. चुनावी समीकरण को अपने पक्ष में करने के लिए पार्टियां लगातार सक्रिय हो रही हैं और जमीन स्तर पर तैयारियों को धार दे रही हैं.

UP Politics: यूपी की राजनीति में अभी तो बस 'खेला' शुरू हुआ है, असली 'पिक्चर' अभी बाकी!
अखिलेश यादव और CM योगी
  • उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने कैबिनेट विस्तार कर छह नए मंत्रियों को शामिल किया है.
  • भाजपा गठबंधन में राष्ट्रीय लोकदल, अपना दल, निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी शामिल हैं.
  • सपा और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे पर कड़ी बातचीत जारी है, कांग्रेस कम से कम सत्तर सीटों की मांग कर रही है.
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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल फरवरी में होने हैं, इसलिए सभी राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं. बीजेपी में लगातार बैठकों का दौर जारी है. चुनाव को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश में कैबिनेट का विस्तार किया गया और 6 नए मंत्रियों को शामिल किया गया, जबकि दो मंत्रियों को स्वतंत्र प्रभार भी दिया गया. बीजेपी इस बार भी गठबंधन के साथ ही चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है, जिसमें राष्ट्रीय लोकदल, अपना दल, निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी शामिल हैं. इस गठबंधन के जरिए बीजेपी प्रदेश के जातीय समीकरण को साधने में सफल रहती है.

वहीं, इसकी काट के तौर पर अखिलेश यादव ‘पीडीए' फॉर्मूला लेकर आए हैं, जिसका मतलब है पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का समीकरण. दूसरी तरफ, इंडिया गठबंधन की बात करें तो उत्तर प्रदेश में इसका स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं है. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच अभी बातचीत शुरू नहीं हुई है. लेकिन दोनों पार्टियों के नेता बयानबाजी जरूर कर रहे हैं. हाल ही में कांग्रेस के दो नेता बीएसपी प्रमुख मायावती से मिलने उनके घर भी पहुंचे, हालांकि मुलाकात नहीं हो सकी. इसके बावजूद इस घटनाक्रम ने यूपी की राजनीति में हलचल बढ़ा दी. इसके बाद समाजवादी पार्टी ने कहा कि वह सभी 403 सीटों पर अपनी तैयारी कर रही है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा किया.

 सीट बंटवारे पर फंसेगा पेच

दरअसल, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद कुछ राजनीतिक घटनाएं ऐसी हुई हैं, जिन्हें इंडिया गठबंधन के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा रहा. बंगाल में राहुल गांधी ने ममता बनर्जी पर तीखा हमला किया, लेकिन ममता बनर्जी की हार के बाद अखिलेश यादव का कोलकाता जाकर उनके साथ खड़ा होना कांग्रेस को पसंद नहीं आया. यहां उल्लेखनीय है कि पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में एक सीट तृणमूल कांग्रेस को भी दी थी. दिल्ली से लेकर लखनऊ तक नेताओं से बातचीत से यह संकेत मिलते हैं कि कांग्रेस और सपा का गठबंधन तो होगा. लेकिन सीट बंटवारे पर कड़ी बातचीत होगी.

70 सीटों की मांग कर रही है कांग्रेस

लोकसभा चुनाव 2024 में सपा 62 सीटों पर लड़ी और 37 जीती, जबकि कांग्रेस 17 सीटों पर लड़ी और 6 सीटों पर जीत हासिल की. एक सीट तृणमूल कांग्रेस ने लड़ी थी. इसी आधार पर कांग्रेस कम से कम 70 सीटों की मांग कर रही है, जबकि समाजवादी पार्टी 50 से ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं दिख रही है. अगर लोकसभा के नतीजों को विधानसभा सीटों में बदलकर देखें तो सपा 184 सीटों पर आगे थी और कांग्रेस 39 सीटों पर. ऐसे में सीट बंटवारे की बातचीत इन्हीं आंकड़ों के आसपास होगी.

ओवैसी कर सकते हैं बड़ा 'खेला'

एक अहम फैक्टर मुस्लिम वोटों का भी है. यूपी में इस बार ओवैसी करीब 50 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी में हैं, खासकर मुरादाबाद, सहारनपुर, आजमगढ़, मेरठ, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और मऊ जैसे इलाकों में. ऐसे में मुस्लिम वोटों के बिखराव को रोकने के लिए सपा को कांग्रेस की जरूरत पड़ सकती है. कांग्रेस की कोशिश है कि मायावती को भी गठबंधन में शामिल किया जाए, क्योंकि यदि बीएसपी अलग चुनाव लड़ती है और मुस्लिम उम्मीदवार उतारती है, तो सपा को नुकसान हो सकता है.

कई जानकार मानते हैं कि बीएसपी, ओवैसी और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी का अलग-अलग चुनाव लड़ना बीजेपी को फायदा पहुंचा सकता है. कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में अभी केवल शुरुआत हुई है और आगे की तस्वीर अभी साफ नहीं है.

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