राजस्थान की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के बीच एक बार फिर सियासी टकराव तेज हो गया है. लंबे समय से शांत दिखाई दे रही यह राजनीतिक अदावत अब फिर से खुलकर सामने आ गई है और दोनों नेताओं के बीच जुबानी जंग का दौर शुरू हो गया है. इस बयानबाजी में केवल दोनों नेता ही नहीं, बल्कि उनके समर्थक भी सक्रिय नजर आ रहे हैं. दरअसल, यह टकराव कोई नया नहीं है. इसकी शुरुआत 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद मानी जाती है, जब जोधपुर सीट पर गजेंद्र सिंह शेखावत ने अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत को बड़े अंतर से हराया था. इसी चुनावी हार के बाद दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत स्तर पर टकराव की स्थिति बनती चली गई. इसके बाद यह विवाद समय-समय पर अलग-अलग मुद्दों के जरिए सामने आता रहा.
गहलोत-शेखावत में जुबानीजंग
इस नए विवाद की शुरुआत हाल ही में जोधपुर में दिए गए गजेंद्र सिंह शेखावत के एक बयान से मानी जा रही है. शेखावत ने सचिन पायलट से जुड़े राजनीतिक संदर्भ में टिप्पणी करते हुए गहलोत पर तंज कसा था. इसके बाद गहलोत ने पलटवार किया और उन्हें घबराया हुआ नेता बताया. वहीं से दोनों नेताओं के बीच बयानबाजी फिर तेज हो गई.
ताजा घटनाक्रम में अशोक गहलोत के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पलटवार किया है. इससे पहले गहलोत ने शेखावत को घबराया हुआ नेता बताते हुए कहा था कि वह अपना मंत्री पद बचाने में लगे हैं और लगातार राजनीतिक बयानबाजी कर रहे हैं. इसके जवाब में शेखावत ने लिखा कि डर उनके खून में नहीं है और गहलोत अपने राजनीतिक अप्रासंगिक होने के डर से बार-बार उन पर हमला करते हैं. शेखावत ने यह भी कहा कि यदि वह राजनीति में नहीं होते तो गहलोत की राजनीतिक स्थिति पहले ही खत्म हो चुकी होती. उन्होंने गहलोत पर सत्ता से चिपके रहने और परिवारवाद की राजनीति करने का आरोप लगाया.
2019 के लोकसभा चुनाव से अदावत
विवाद को सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ 2020 में मिला, जब संजीवनी क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसायटी घोटाले की जांच तेज हुई. इस मामले में हजारों निवेशकों के पैसे फंसने के आरोप सामने आए थे और राजस्थान पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने जांच शुरू की थी. जांच के दौरान कुछ आरोपियों के बयानों और केस डिटेल्स के आधार पर राजनीतिक संरक्षण और संपर्कों की चर्चा सामने आई. अशोक गहलोत ने इस मामले में गजेंद्र सिंह की भूमिका को लेकर कई बार बयान दिए. एसओजी ने जांच भी शुरू की. इस पूरे प्रकरण में गजेंद्र सिंह शेखावत का नाम राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया, हालांकि उन्होंने इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया.
ऑडियो टेप विवाद और सरकार गिराने का आरोप
2020 के राजस्थान राजनीतिक संकट के दौरान अशोक गहलोत ने कुछ ऑडियो टेप सार्वजनिक होने का दावा किया था. इन टेप्स में सरकार गिराने की साजिश और विधायकों की खरीद-फरोख्त की बातों का आरोप लगाया गया था. गहलोत ने उस समय आरोप लगाया था कि इस कथित साजिश में गजेंद्र सिंह शेखावत की भूमिका है और उन्होंने सीधे तौर पर उनका नाम लिया था. वहीं शेखावत ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे झूठा और राजनीतिक साजिश बताया. इसके बाद यह मामला दिल्ली क्राइम ब्रांच और अन्य एजेंसियों की जांच के दायरे में आया और दोनों पक्षों के बीच कानूनी लड़ाई शुरू हो गई. गहलोत की ओर से लगाए गए आरोपों और ऑडियो विवाद के बाद शेखावत ने मानहानि और अन्य मामलों में कानूनी कार्रवाई की. वहीं संजीवनी केस से जुड़े मामलों में जांच एजेंसियों ने कई स्तर पर पूछताछ और कार्रवाई की.
गहलोत और शेखावत के बीच ईस्टर्न राजस्थान कैनाल प्रोजेक्ट यानी ईआरसीपी को लेकर भी लंबे समय से जुबानी जंग जारी है. गहलोत ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार इस परियोजना को मंजूरी नहीं दे रही थी, जबकि शेखावत का कहना रहा है कि राज्य सरकार ने जरूरी प्रक्रियाएं और औपचारिकताएं पूरी नहीं कीं, जिसके कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ पाई. पिछले कुछ वर्षों में दोनों नेताओं के बीच यह विवाद केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यक्तिगत टिप्पणी और तीखी बयानबाजी तक पहुंच चुका है.
कुल मिलाकर, अशोक गहलोत और गजेंद्र सिंह शेखावत के बीच यह सियासी टकराव थमने का नाम नहीं रहा है. 2019 लोकसभा चुनाव से शुरू हुई यह राजनीतिक अदावत, संजीवनी घोटाले, 2020 के ऑडियो टेप विवाद और लगातार आरोप-प्रत्यारोप के दौर से गुजरते हुए अब राजस्थान की राजनीति का एक स्थायी विवाद बन चुकी है.
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