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विचार
  • योगेंद्र यादव और पश्चाताप की गांधीवादी विरासत
    प्रियदर्शन
    किसान आंदोलन ने बीते एक वर्ष में कई भूलें की हैं. 26 जनवरी को लाल किले पर जो कुछ हुआ, उसने आंदोलन को काफी क्षति पहुंचाई थी. लखीमपुर कांड के बाद भीड़ की हिंसा और फिर गुरु ग्रंथ साहिब के अपमान के नाम पर एक शख्स की बर्बर हत्या वे बदनुमा दाग हैं जो किसान आंदोलन के पूरे वजूद पर सवाल खड़े करते हैं.
  • आर्यन ख़ान की ज़मानत और कानून के सवाल
    रवीश कुमार
    बीस हज़ार करोड़ का 3000 किलोग्राम ड्रग्स पकड़ा गया. उसे लेकर कितना कम कवरेज़ हुआ, छह ग्राम चरस पकड़ा गया उसे लेकर जो कवरेज़ हो रहा है, पता चलता है कि बीस हज़ार करोड़ से ज़्यादा शाहरुख़ ख़ान की कितनी वैल्यू है और उस जनता की कितनी कम वैल्यू हो गई है जो आराम से 117 रुपया पेट्रोल भरा रही है जो कभी 65 रुपया लीटर होने पर आंदोलन करती थी.
  • प्रदर्शनों को कुचलने की दुनिया भर में तैयारी
    रवीश कुमार
    जनता कहां प्रदर्शन करेगी, क्या उस शहर में प्रदर्शन नहीं होगा जहां कोई मैदान या बड़ा पार्क नहीं होगा और होगा तो सरकार नहीं देगी. भारत में प्रदर्शन शुरू नहीं होता कि बंद कराने की बात होने लगती है. अब अमेरिका में भी प्रदर्शन करने के अधिकारों के खिलाफ कानून बनने लगे हैं.
  • इसे राष्ट्रवाद का टीका न बनाएं
    प्रियदर्शन
    टीकाकरण के इस समारोह में यह सुविधापूर्वक भुला दिया गया है कि अभी छह महीने भी नहीं हुए हैं जब इस देश के कोविड पीड़ित लोग ऑक्सीजन के लिए सड़कों पर तड़प रहे थे, अस्पतालों में बिस्तरों के अभाव में दम तोड़ रहे थे, ब्लैक में दवाएं और इंजेक्शन खरीद रहे थे और पुण्य करने के नाम पर गुजरात से दिल्ली तक बीजेपी के नेता इसे मुफ़्त भी बंटवा रहे थे जिस पर अदालत ने भी सख़्त सवाल किए.
  • अफगानिस्तान पर भारत का नरम रुख?
    कादम्बिनी शर्मा
    अगर अफगानिस्तान के मौजूदा हालात को देखें तो लगता नहीं कि कोई भी और पक्ष एक सरकार बनाने की हालत में है. रेसिसटेंस फोर्स अब कहीं नज़र नहीं आ रहा, ना ही कोई बड़ा समर्थन किसी और देश से उन्हें मिलता दिख रहा है. रूस और अमेरिका ने जिस तरह अफगानिस्तान छोड़ा उसके बाद शायद ही कोई देश एक बार फिर यहां पर उस तरह से आने की कोशिश करे.
  • किसान आंदोलन - कोर्ट में सुनवाई, सरकार कहां गई?
    रवीश कुमार
    जिस देश में आज़ादी की लड़ाई का आंदोलन 1857 से 1947 तक अलग अलग रूप में चला हो, उस देश के सुप्रीम कोर्ट में शाहीन बाग धरने के बाद किसानों के धरने को लेकर चल रही बहस में अजीब अजीब किस्म के सवाल उठ रहे हैं कि आंदोलन कब तक चलेगा, क्यों चल रहा है, अनंत काल के लिए सड़कें बंद नहीं हो सकती हैं.
  • प्रियंका का मास्टर स्ट्रोक : महिलाओं को 40 फीसदी टिकट
    मनोरंजन भारती
    प्रियंका ने उत्तर प्रदेश के साथ ही देश की आने वाली राजनीति का एजेंडा तय कर दिया. देश की राजनीति का एजेंडा इसलिए क्योंकि अभी भी अपने यहां चुनाव जात-पांत के आधार पर ही लड़ा जाता है. वैसे हालात में देश की आधी आबादी की बात करना किसी गेम चेंजर से कम नहीं है. जाहिर है इससे उत्तर प्रदेश की राजनीति काफी दिलचस्प हो जाने की उम्मीद है क्योंकि जब 40 फीसदी टिकट महिलाओं को दिया जाएगा तो मुख्यमंत्री भी महिला ही होनी चाहिए.
  • क्या कोई जानता है, कश्मीर में क्या हो रहा है?
    रवीश कुमार
    जम्मू कश्मीर में क्या हो रहा है, यह जानना होगा तो आप किसी न किसी से पूछेंगे. सेना और पुलिस के बयान से किसी घटना की जानकारी मिलती है लेकिन राजनीतिक तौर पर कश्मीर के भीतर क्या हो रहा है इसकी आवाज़ तो उन्हीं से आएगी जिनकी जवाबदेही है. इतना कुछ हो रहा है फिर भी कश्मीर पर कोई विस्तृत प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं है. इसके अलावा बाकी के पारंपरिक रास्ते या तो बंद हो चुके हैं या कमज़ोर कर दिए गए हैं जैसे राजनीतिक दल,नागरिक संगठन, NGO और मीडिया. 5 अगस्त 2019 को धारा 370 की समाप्ति के बाद इन सभी की हालत पर आप गौर कर लेंगे तो पता चलेगा कि कश्मीर पर जानने के लिए आपके पास गोदी मीडिया ही है जो कि ख़ुद नहीं जानता कि वहां क्या हो रहा है. धारा 370 की समाप्ति के दो साल से भी अधिक समय हो चुके हैं, न तो राज्य की बहाली हुई है और न ही राजनीतिक प्रक्रिया को लेकर ठोस पहल. जिसकी बहाली के लिए दिल्ली में 24 जून को दिल्ली में कश्मीर के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री ने बैठक भी की. इस बैठक में कश्मीरी पंडितों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था, न उनका ज़िक्र हुआ था. 
  • प्रियंका लड़की हैं, लड़ सकती हैं
    प्रियदर्शन
    यही मोड़ है जहां प्रियंका गांधी का फ़ैसला एक संभावना की ओर इशारा भी करता है. महिलाओं ने पहले भी चुनावी राजनीति बदली है और चुनाव-पंडितों को अंगूठा दिखाया है.
  • पेट्रोल की मार के मुद्दे को उचित स्थान कब देगी सरकार
    रवीश कुमार
    बहुत ज़रूरी है कि हम उस उचित स्थान को तय कर दें जिसके न मिलने पर आए दिन राजनीति होती है. तय किया जाना चाहिए कि उचित स्थान का क्या मतलब है और ये कहां पर होता है. इतिहास के जिस मुद्दे को इतिहास की कक्षा में उचित स्थान मिलना चाहिए उसे लेकर टीवी पर चर्चा है और वर्तमान के जिस मुद्दे को मीडिया में उचित स्थान मिलना चाहिए उसके लिए कोई स्थान नहीं है.आम लोगों के लिए पेट्रोल और डीज़ल के दाम उनकी चिन्ता रेखाओं में पहली हेडलाइन की तरह मौजूद है लेकिन अख़बारों और चैनलों के समाचारों में पेट्रोल और डीज़ल के दाम संक्षिप्त ख़बरों के कॉलम और स्पीड न्यूज़ के हवाले कर दिए गए हैं. 
  • सोनिया गांधी का G-23 को शह और मात
    आदेश रावल
    आज की कार्यसमिति की बैठक का सार यह है कि फ़िलहाल कांग्रेस को बिखरने से रोकने के लिए सोनिया गांधी के नेतृत्व की आवश्यकता है.
  • उसने कहा था, वह कभी उदास नहीं रहेगी
    प्रियदर्शन
    इन कुछ वर्षों में ही अपराजिता शर्मा के साथ आत्मीयता का एक मज़बूत धागा बहुत गहराई से जुड़ता चला गया. मैंने पाया कि वह बहुत प्रतिबद्ध क़िस्म की कलाकार है. मौजूदा राजनीतिक रुझानों के विपरीत उसने बहुत खुल कर अपनी राय बार-बार जाहिर की और अपने रेखांकनों के ज़रिए अपने हिस्से का प्रतिरोध लगातार जताया.
  • गांधी इस देश के राष्ट्रपिता क्यों हैं
    प्रियदर्शन
    दरअसल गांधी को समझना इस देश के गुणसूत्रों को भी समझना है. गांधी इस देश की मिट्टी को पहचानते हैं. बेशक, इस पहचान को लेकर वे बीच-बीच में अपनी राय बदलते भी हैं. लेकिन सत्य, अहिंसा, सहिष्णुता उनके दर्शन के बीज शब्द हैं. वे यह भी मानते हैं कि ये बीज उन्हें भारतीयता की उदार परंपरा से मिले हैं. मगर ऐसा नहीं कि इस परंपरा से जो भी मिल रहा है, वह उन्हें स्वीकार्य है. इसके क्रूर या अमानवीय तत्वों की वे आलोचना करते हैं और उन्हें बदलने की कोशिश करते हैं.
  • सावरकर की रक्षा के लिए अब गांधी का ही सर्टिफ़िकेट लेकर आए हैं रक्षा मंत्री!
    प्रियदर्शन
    इसमें शक नहीं कि महात्मा गांधी सावरकर की रिहाई के हक़ में थे. यही नहीं, अपनी रिहाई न होने से मायूस सावरकर जिन लोगों को चिट्ठियां लिख रहे थे या तार भेज रहे थे, उनमें महात्मा गांधी भी थे. महात्मा गांधी ने भी सावरकर की रिहाई को लेकर ब्रिटिश सरकार को चिट्ठी लिखी थी. यह जानना दिलचस्प है कि सावरकर की रिहाई के लिए गांधी ने क्या-क्या दलीलें दी थीं. महात्मा गांधी ने बेशक सावरकर के शौर्य की तारीफ़ की थी, लेकिन यह भी कहा था कि वे ब्रिटिश सरकार के वफ़ादार हैं. वे मानते हैं कि भारत के सर्वोत्तम हित ब्रिटिश सरकार के साथ ही रहने में हैं.
  • आदेश रावल का ब्लॉग : क्या दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बन जाएंगे राहुल गांधी...?
    आदेश रावल
    सूत्रों के मुताबिक, 16 अक्टूबर को होने वाली कांग्रेस कार्यसमिति की महत्वपूर्ण बैठक मे कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए होने वाले चुनाव की तारीख़ों का ऐलान होने वाला है. अक्टूबर, 2021 से लेकर 2022 तक पूरा लेखा-जोखा बताया जाएगा.
  • 'मुझ पर छोड़ दें' : लखीमपुर को लेकर योगी आदित्‍यनाथ का बीजेपी को  संदेश
    स्वाति चतुर्वेदी
    अजय मिश्रा ने इस बात से इनकार किया है कि उनका बेटा आशीष, जिसका पुलिस केस में  हत्‍या के आरोप में  नाम है, इस कार को चला रहा था. उन्‍होंने बुधवार को अपने 'बॉस' अमित शाह के साथ बैठक में  केंद्रीय मंत्री पद से इस्‍तीफा देने से इनकार कर दिया. टेनी ने कहा है कि वो पद नहीं छोड़ेंगे. शायद इसीलिए मीडिया को दिल्‍ली में गृह मंत्रालय के उस आधिकारिक कार्यक्रम से 'अलग' कर दिया गया  जिसमें टेनी ने हिस्‍सा लिया था. 
  • सम्मान से समन धरिए जी, आशीष के पिता हैं मंत्री जी
    रवीश कुमार
    विपक्ष के नेताओं को बिना किसी लिखित आदेश के हिरासत में लेने वाली यूपी पुलिस ने एक मंत्री के बेटे के प्रति जो समन का सम्मान दिखाया है, उसकी सराहना की जानी चाहिए क्योंकि आलोचना से कुछ फर्क नहीं पड़ रहा है.
  • राहुल गांधी की नई कांग्रेस...
    मनोरंजन भारती
    जिस ढंग से चरणजीत सिंह चन्नी को लखीमपुर प्रदर्शन में शामिल किया गया उससे साफ हो गया कि कांग्रेस उन्हें एक बड़े दलित नेता के तौर पर पेश करने वाली है, ठीक बूटा सिंह की तरह. फिर जब छत्तीसगढ़ और पंजाब के मुख्यमंत्रियों ने 50-50 लाख के मुआवजे का ऐलान किया तो लगा कि कांग्रेस इस बार गंभीरता और प्लानिंग के साथ मैदान में उतरी है.
  • क्या लखीमपुर को कांग्रेस अपने 'अण्णा लम्हे' में बदल सकती है?
    केंद्र सरकार किसान आंदोलन को लेकर जो अहंकारी रवैया दिखाती रही है, उसकी पूरी तस्वीर लखीमपुर खीरी की वारदात में सामने आई है. इसके बाद राज्य और केंद्र सरकार का रुख़ कुछ वैसा ही है जैसा अण्णा आंदोलन की शुरुआत में 2010 के आसपास यूपीए सरकार का था. वह समझ ही नहीं पाई कि अण्णा आंदोलन से कैसे निबटें.
  • प्रधानमंत्री जी, गृह राज्यमंत्री को 28 सेकेंड का यह वीडियो दिखाइए
    रवीश कुमार
    28 सेकेंड का यह वीडियो है. एक सेकेंड के वीडियो में 24 से 30 फ्रेम होते हैं. 840 फ्रेम. 28 सेकेंड के इस वीडियो के एक एक फ्रेम में क्रूरता और मंत्री के झूठ की ऐसी गवाहियां हैं कि इस 28 सेकेंड का पूरा ब्यौरा बताने के लिए 28 घंटे भी कम पड़ जाएं. सोमवार रात दुनिया भर में व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम और फेसबुक के बाद भी अकेले ट्विटर से यह वीडियो इतना वायरल हो गया कि लखीमपुर खीरी के किसानों की हत्या को लेकर फैलाया गया झूठ का शामियाना उजड़ गया. वह वीडियो उस जीप की कहानी का सच लेकर आ गया है जिसने शांति से लौट रहे किसानों को पीछे से कुचल दिया. लेकिन यह वीडियो केवल यह बताने नहीं आया कि किसानों को जीप ने कैसे कुचला, बल्कि यह बताने आया है कि थार जीप और गोदी मीडिया में कोई अंतर नहीं है. जिस तरह से जीप ने किसानों को कुचल दिया उसी तरह गोदी मीडिया हर दिन लोगों को कुचल रहा है. गोदी मीडिया के एंकरों और चैनलों ने आपको नज़रबंद कर लिया है. यह वीडियो नहीं आता तो आपके मन में एक संदेह सच का रूप ले चुका होता कि किसान ही उपद्रवी हैं. और इस तरह से किसानों की हत्या करने वाले आपकी निगाहों में संत हो जाते. 
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