NDTV Khabar
होम | ब्लॉग

ब्लॉग

विचार
  • सूत्रों के अनुसार राजनीतिक पत्रकारिता का अंत हो चुका है
    रवीश कुमार
    ख़बरों की दुनिया में सूत्रों को लेकर भूचाल आया हुआ है या तो सूत्र बदल गए हैं या फिर पत्रकार पत्रकार नहीं रहे. सवाल है कि ग़लत जानकारी देने वाले पत्रकार ग़लत जानकारी देने वाले सूत्रों के साथ क्या करते हैं. क्या ग़लत जानकारी देने के बाद भी उन सूत्रों के संपर्क में रहते हैं या नए सूत्र बना लेते हैं जो नए सिरे से ग़लत जानकारी दे सके. एक पाठक और दर्शक के लिए सूत्रों के हवाले से आने वाली ख़बरों और पत्रकारिता के संकट को समझना ज़रूरी हो जाता है ताकि पता रहे कि ख़बरों के लिए जिन ज़रूरी तत्वों पर आप भरोसा करते हैं वह भरोसे के लायक है भी या नहीं.
  • कैसे बदली रातों रात पंजाब की सियासत?
    आदेश रावल
    पंजाब को दलित मुख्यमंत्री देकर कांग्रेस ने अपने लिए मास्टर स्ट्रोक चला ही साथ ही आम आदमी पार्टी को भी विधानसभा चुनाव से पहले झटका दे दिया.
  • पाकिस्तान क्रिकेट का कत्ल
    संजय किशोर
    18 साल बाद कीवी टीम पाकिस्तान आयी थी. रावलपिंडी में 3 वनडे के बाद लाहौर में 5 T20 खेले जाने थे. आज से सीरीज़ का आग़ाज़ होने जा रहा था.
  • भारत का किसान महीने का इतना कम कमाता है?
    रवीश कुमार
    किसान आंदोलन में शामिल किसान किसी अहं की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं. वे दशकों से खेती को लेकर सरकारों के वादों का हश्र देख रहे हैं. अपने आस-पास के लोगों को खेती से अलग होते देख रहे हैं.
  • क्या NEET अंग्रेजी माध्यम, अमीरों की परीक्षा है?
    रवीश कुमार
    कानून को लेकर केंद्र और राज्य के बीच टकराव का एक नया मोर्चा नीट परीक्षा को लेकर खुल गया है. केंद्र के नागरिकता कानून, कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ कई राज्यों की विधानसभा में प्रस्ताव पास हुए हैं. इस कड़ी में नीट की परीक्षा का मुद्दा भी जुड़ गया है.
  • विराट ने कप्तानी छोड़ी या छीनी गयी?
    संजय किशोर
    एक दिन पहले ही मैंने ब्लॉग में लिखा था “दबाव में तो हैं कोहली”. उसके 24 घंटे के अंदर कोहली ने T20 टीम की कप्तानी छोड़ने का एलान कर दिया. आईसीसी T20 वर्ल्ड कप के बाद कोहली क्रिकेट के सबसे छोटे फ़ॉर्मेट की कमान छोड़ देंगे. टेस्ट और वनडे में वे कप्तान बने रहेंगे.
  • सोनू सूद से हर्ष मंदर तक- इन कार्रवाइयों का क्या मतलब है?
    प्रियदर्शन
    सोनू सूद के घर आयकर टीम क्यों पहुंची? सोनू सूद ने ऐसा क्या किया कि सरकार को अपनी एजेंसियां उसके घर दौड़ानी पड़ीं? क्या वाकई दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार के एक शैक्षणिक कार्यक्रम में ब्रांड अंबैसडर के तौर पर सोनू सूद का जुड़ना सरकार को इतना बुरा लगा कि उसने तत्काल उन्हें सबक सिखाने की सोच ली?
  • बीजेपी पर हावी आलाकमान संस्कृति, दूसरे राज्यों में भी लागू होगा गुजरात मॉडल?
    अखिलेश शर्मा
    अपने पहले पांच साल के कार्यकाल में केवल एक मुख्यमंत्री हटाने वाले नरेंद्र मोदी अपने दूसरे कार्यकाल के केवल डेढ़ साल में पांच मुख्यमंत्री बदल चुके हैं. पीएम मोदी के गृह राज्य गुजरात में तो बीजेपी एक कदम और आगे बढ़ गई. न केवल मुख्यमंत्री बर्खास्त हुआ. बल्कि उसकी पूरी कैबिनेट ही बर्खास्त कर दी गई.
  • भाषण और उद्घाटन से यूनिवर्सिटी नहीं चलती
    रवीश कुमार
    भारतीय प्रबंध संस्थान  (Indian Institute of Management) का निदेशक बनने के लिए बीए में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होना अनिवार्य है. इससे दुखी होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि इसके बाद भी निदेशक बना जा सकता है. विश्व गुरु भारत में 2017 से यह विवाद चल रहा है. IIM रोहतक के निदेशक धीरज शर्मा की बीए की डिग्री का पता नहीं चल रहा है. इंडियन एक्स्प्रेस की ऋतिका चोपड़ा ने लिखा है कि केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने दो-दो बार पत्र लिखा लेकिन डिग्री का पता नहीं चला और अब तो निदेशक जी का पांच साल का कार्यकाल भी समाप्त होने वाला है. निदेशक से रिपोर्टर ने संपर्क भी किया लेकिन जवाब नहीं दिया. 
  • दबाव में तो हैं कोहली...
    संजय किशोर
    दबाव में तो हैं भारतीय कप्तान विराट कोहली. ख़ासकर मुख्य कोच रवि शास्त्री के बुक लॉन्च में शामिल होने के बाद उन पर 'बायो बबल ब्रीच' करने का आरोप लगा. इंग्लिश मीडिया और पूर्व इंग्लिश खिलाड़ी पांचवे टेस्ट के रद्द होने के लिए उन्हें सीधे तौर पर ज़िम्मेदार मान रहे हैं.
  • हिंदी की विडंबनाओं का हिमालय
    प्रियदर्शन
    दुनिया के करोड़ों हिंदीभाषियों के लिए हिंदी दिवस गर्व का नहीं, शर्म का विषय होना चाहिए. लेकिन हर साल यह बात दुहराते जाने के बावजूद हम इस शर्म को हर बार गर्व की तरह ओढ़ने को मजबूर होते हैं. आखिर वह कौन सी विडंबना है जो एक भाषाबहुल देश की सबसे बड़ी भाषा के तौर पर हिंदी की सहज स्वीकृति के आगे ऐसी प्रश्नवाचकता लगाती है कि हमें हिंदी दिवस और उसके कर्मकांड ज़रूरी लगने लगते हैं?
  • 5 साल की सावन्या की वो खुली आंखें मुझे नहीं सोने दे रहीं…
    सौरभ शुक्ला
    सावन्या ने अपनी आंखें खोली और गर्दन घुमाकर अपनी मां की तरफ देखा. मां को लगा बच्ची को होश आ रहा है, पर सावन्या ने जो आंख खोली तो फिर पलकें नहीं झपकाई. मां चिल्लाई कि ये उठ गई है, पर पलक नहीं झपका रही, मैं ज़ोर से चिल्लाया “डॉक्टर साहब”. डॉक्टर दौड़कर आए और बोले बच्ची नहीं रही...
  • यूपी के अस्पतालों में मरीज पस्त, उधर हुक्मरान राजनीति में मस्त
    रवीश कुमार
    24 जून को अमेरिका के फ्लोरिडा में एक इमारत के गिर जाने से 98 लोगों की मौत हो गई. जून से सितंबर आ गया लेकिन अभी तक इस घटना को लेकर अमेरिका के अख़बारों में खोजी पत्रकारिता हो रही है. हर दूसरे दिन कुछ न कुछ रिपोर्ट आती है. पता चलता है कि 100 लोगों के जीवन का क्या महत्व है. इमारत के रख-रखाव में हुई लापरवाही को वहां का समाज और प्रेस कितनी गंभीरता से ले रहा है. 2019 में गुजरात के सूरत में तक्षशिला आर्केड में आग लगने से 22 बच्चे जल कर मर गए थे. उसके बाद क्या हुआ आप खबरों को इंटरनेट में खंगाल कर देखिए. भारत में मार्च और अप्रैल के महीने में ऑक्सीजन के बिना लोग मर गए लेकिन कह दिया गया कि आक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा है. कोरोना की दूसरी लहर के समय अस्पतालों की हालत पर थोड़ी बहुत चर्चा हुई लेकिन उसके बाद चर्चा समाप्त हो गई. अस्पतालों में सुधार के दावे कर लिए गए और मान लिया गया. 2019 में बिहार में चमकी बुखार से 160 से अधिक बच्चे मर गए थे. बिहार के समस्तीपुर के सदर अस्पताल में 10 अगस्त को RT-PCR जांच घर का उदघाटन हुआ. उस दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने छह जांच केंद्रों का आनलाइन उदघाटन किया लेकिन एक महीने बाद भी समस्तीपुर का जांच केंद्र चालू नहीं हुआ है.
  • विजय रूपाणी का इस्तीफा.. पर्दे के पीछे की कहानी
    स्वाति चतुर्वेदी
    गुजरात को अपनी अगली सरकार चुनने के बमुश्किल 15 महीने पहले विजय रूपाणी ने आज मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. उन्हें भाजपा हाईकमान से लिखित संदेश मिला था.
  • दोपहिया वालों के लिए एक्सप्रेस वे क्यों नहीं है
    रवीश कुमार
    अक्सर दिल्ली को कार वालों की नज़र से देखा जाता है लेकिन इस महानगर में बोलबाला बाइकर्स का है. 70 लाख से अधिक बाइक यहां पंजीकृत हैं. दिल्ली की सड़कों पर कार और बाइक की रफ्तार बहुत अधिक नहीं है इसलिए यहां की सड़कों पर कार और बाइक के हिसाब से अलग नहीं किया गया है और न करना संभव है.
  • टेक्सटाइल सेक्टर में 6000 करोड़ से आने वाला 1 करोड़ रोज़गार कहां गया?
    रवीश कुमार
    सरकार कभी नहीं बताती कि कितनों को रोज़गार मिला लेकिन यह ज़रूर बताती है कि फलां योजना में कितनों को रोज़गार मिलेगा. मिलेगा के नाम पर आंकड़ा कुछ भी बता दिया जाता है, कभी 50 लाख तो कभी एक करोड़ तो कभी साढ़े सात लाख. आप मंत्रियों के पुराने बयान को निकालेंगे तो यह तो पता चलेगा कि इतना लाख रोज़गार मिलने वाला है लेकिन फिर उस पर दोबारा प्रेस कांफ्रेंस नहीं होती है कि हमने कहा था इतना लाख मिलेगा लेकिन मिला उससे कम या ज़्यादा.
  • तालिबान से इतना डरने की वजह क्या है?
    प्रियदर्शन
    यह सच है कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की हुकूमत वहां की जनता के लिए किसी दु:स्वप्न से कम नहीं. वहां फिर इस्लाम और शरीयत के नाम पर ऐसे क़ानून थोपे जा रहे हैं, जिनका समानता, स्वतंत्रता और विवेक से वास्ता नहीं दिखता है.
  • किसानों के हक की लड़ाई, सरकार की नाक की लड़ाई
    रवीश कुमार
    करनाल में किसानों के प्रदर्शन ने एक बार फिर से उजागर किया है कि प्रदर्शन करने का अधिकार भी लड़ कर लिया जाता है. करनाल में किसानों ने सचिवालय का घेराव कर सरकार की बनाई लक्ष्मण रेखा की जगह अपनी लक्ष्मण रेखा खींच दी है कि वे कहां तक जा सकते हैं. दिल्ली की सीमाओं पर 9 महीने से रोके गए किसानों ने करनाल शहर के भीतर लघु सचिवाल के पास अपना नया मोर्चा बना लिया है. हज़ारों की संख्या में किसान यहां रात भर मौजूद रहे. खुले आसमान के नीचे रात बिताई. यहीं खाना खाया और सो गए. संयुक्त किसान मोर्चा ने ट्वीट किया कि किसानों ने फुटपाथ पर रात गुज़ारी है. सुबह तक यहां टेंट लगने शुरू हो गए. कोरोना के काल में सेवा करने वाले गुरुद्वारे से श्रद्धालु यहां सेवा देने आ चुके हैं.
  • किसानों ने की आवाज बुलंद, दिल्ली के कान बंद
    रवीश कुमार
    करनाल में किसान आंदोलन और ज़िला प्रशासन दोनों एक दूसरे के लिए चुनौती बन गए हैं. आज किसान नेताओं और प्रशासन के बीच दो दौर की बातचीत नाकाम हो गई. दोपहर बाद किसान नेताओं ने कहा कि अब वे ज़िला प्रशासन से बात नहीं करेंगे. इसी के साथ फैसला हुआ कि करनाल स्थित लघु सचिवालय की तरफ मार्च किया जाएगा. किसान नेताओं ने कहा कि जो प्रशासन दे रहा है और वो हम नहीं मान सकते और जो हम मांग कर रहे हैं वो प्रशासन नहीं मान रहा है. इसके बाद बड़ी संख्या में किसानों ने लघु सचिवालय की तरफ मार्च शुरू कर दिया. किसानों ने शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ना शुरू किया और प्रशासन ने भी उन्हें आने दिया. दो-दो बैरिकेड पार कर किसान आगे बढ़ते रहे. किसानों की यह संख्या बता रही थी कि सचिवालय के पास पहुंचकर वहां किस तरह की चुनौती होने वाली है. प्रशासन के लिए भी यह चुनौती थी कि वह इतनी भीड़ को संभाले और किसानों के लिए भी संयम से घेराव करने की चुनौती होगी. शाम के वक्त दोनों ओर से तनाव की खास स्थिति नज़र नहीं आई. योगेंद्र यादव ने बयान दिया कि किसानों ने सचिवालय घेर लिया है और शांतिपूर्ण तरीके से सब चल रहा है.
  • क्या किसान आंदोलन पश्चिमी यूपी में दंगों के दाग मिटा पाएगा?
    रवीश कुमार
    किसान आंदोलन के नेता अगर चाहते हैं कि प्रधानमंत्री उनसे बात करें तो उन्हें महापंचायत का आयोजन नहीं करना चाहिए. उन्हें किसान महापंचायतों की जगह कबड्डी, खो-खो, हॉकी का आयोजन करना चाहिए ताकि इन खेलों में विजय प्राप्त करते ही विजयी किसान नेताओं को प्रधानमंत्री का फोन आ जाए और फिर उस बातचीत का वीडियो न्यूज़ चैनलों पर भी ख़ूब चलेगा. यह प्रसंग इसलिए आया कि खिलाड़ियों के लिए सुलभ प्रधानमंत्री किसानों के लिए कितने दुर्लभ हो गए हैं. नौ महीने से अनगिनत महापंचायतों, धरना-प्रदर्शनों और किसान संसद के आयोजन के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी की किसान नेताओं से बात नहीं हुई जबकि उन्होंने कहा था कि वे एक कॉल की दूरी पर हैं. कभी कुछ किसानों का आंदोलन तो कभी बड़े किसानों का आंदोलन बता कर इस आंदोलन को खारिज करने के बाद किसान हर बार अपनी रैलियों के ज़रिए बता रहे हैं कि उनका आंदोलन किसका है. 
«1234567»

Advertisement

 
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com