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विचार
  • क्रिकेट में कोच का क्या काम!
    संजय किशोर
    क्या क्रिकेट में कोच की कोई भूमिका है? है भी तो किस स्तर तक? अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कोच की भूमिका पर कई बार सवाल उठते रहे हैं. बहस होती रही हैं. कहा गया कि अनिल कुंबले के ख़िलाफ़ बग़ावत के पीछे एक बड़ा कारण रहा कि वे खिलाड़ियों को उनकी तकनीक पर बहुत ज़्यादा सलाह देते थे या यूं कहिए हस्तक्षेप करते थे.
  • 8 लाख पद ख़ाली, भर्ती की याद क्‍यों नहीं आती?
    रवीश कुमार
    क्या चुनावों के समय जाति और समुदाय के नेता ही नाराज़ होते हैं, उन्हें मनाने के नाम पर मंत्रियों की लाइन लगी रहती है लेकिन नौकरी मांग रहे छात्रों को नाराज़ क्यों नहीं माना जाता है, उन्हें मनाने के लिए कोई मंत्री उनके हास्टल या प्रदर्शन में क्यों नहीं जाता है?
  • यहां से कांग्रेस कहां जाएगी? खिलेगी या ख़त्म हो जाएगी?
    प्रियदर्शन
    भारतीय राजनीति में- या संसदीय लोकतंत्र में- बहुत सारी चीज़ें बदल चुकी है. राजनीति में असंभव को साधने का खेल इतनी बार किया जा चुका है कि बस अब असंभव ही संभव लगता है.
  • आरपीएन का जाना मर्ज नहीं नासूर है, कांग्रेस को इसका इलाज ढूंढना पड़ेगा
    मनोरंजन भारती
    सबसे बड़ा सवाल है कि हाल के सालों में ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, सुष्मिता देव, अशोक तंवर और प्रियंका चतुर्वेदी जैसे लोग कांग्रेस छोड़ कर क्यों चले गए. निश्चित रूप से यह कांग्रेस की लीडरशिप पर एक टिप्पणी है कि तथाकथित युवा चेहरे जो राहुल और प्रियंका के नजदीक माने जाते रहे वो क्यों उन्हें छोड़ रहे हैं.
  • 'टीम राहुल' को बीजेपी की एक और चोट
    अखिलेश शर्मा
    बीजेपी की बात करें तो उसके लिए उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बचाना बेहद जरूरी है. गृह मंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि अगर मोदी को 2024 में फिर से पीएम बनाना है तो 2022 में यूपी जीतना जरूरी है.
  • नेताजी के नाम पर अपनी नौकरी बचाते नेताजी
    रवीश कुमार
    हम बात नौकरी की भी करेंगे और नेता जी भी करेंगे. थोड़ी नेताजी की थोड़ी नौकरी की. जब भी चुनाव आता है, और स्वास्थ्य से लेकर रोज़गार पर बात करने का अवसर मिलता है, नेता और मीडिया बहस की दिशा को इतिहास और धर्म की तरफ मोड़ देते हैं. किसी महापुरुष को याद करने के नाम पर खुद को महापुरुष साबित करने की होड़ शुरू हो जाती है. मूर्ति, स्मारक, पार्क इत्यादि के नाम रखने के बहाने याद किया जाने लगता है. ट्वीटर पर मीम और टीवी चैनलों पर डिबेट के ज़रिए इतिहास की पढ़ाई होने लगती है. जहां पढ़ाई होनी चाहिए वहां न तो शिक्षक हैं और न ही लाइब्रेरी में किताबें. वोट के लिए इतिहास चालू टॉपिक हो गया है. नेता पार्ट टाइम से अब फुल टाइम इतिहासकार हो गए हैं और इतिहास से एमए रिज़र्व बैंक के गर्वनर बन रहे हैं. ग़लत इतिहास को सही करने के नाम पर अपने मन के हिसाब से ग़लत किए जा रहे हैं. इतिहास को सही करने के नाम पर आपके साथ जो ग़लत हो रहा है उसे समझना आपके बस की बात नहीं है और समझाना हमारे बस की बात नहीं.
  • क्या सुभाष चंद्र बोस बीजेपी की कृपा के मोहताज हैं?
    प्रियदर्शन
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिल्कुल सही कहा कि अतीत की भूलों को सुधारना चाहिए. लेकिन अतीत की भूलों को सुधारने का क्या मतलब होता है? क्या किसी नेता की मूर्ति को कहीं लगा देना ही अतीत की भूलों का सुधार है?
  • फ़ायर था मय!
    संजय किशोर
    विराट कोहली पुष्पा की तरह बंदूक़ की फ़ायर की आवाज़ और एटीट्यूड में खोए रहे और इधर अंदर-अंदर बीसीसीआई तीली वाली आग सुलगाता रहा. आग की लपट बढ़ती गयी और जद में आकर विराट कप्तानी छोड़ते गए.
  • इसलिए ज़रूरी है इस कविता पर पाबंदी!
    प्रियदर्शन
    जब कोई जान जाता है कि वह हमारी गाली, नाली और अलग की हुई थाली में आता है और इसे बड़ी सहजता से कह देता है तो क्या होता है? हमारे भीतर हमारी सोई हुई शर्म कुछ देर के लिए जाग जाती है.
  • अपर्णा यादव के BJP में जाने से समाजवादी पार्टी को कितना नुकसान और भाजपा को कितना फायदा? 
    2017 में समाजवादी पार्टी में पारिवारिक कलह चरम पर थी. उस वक्त भी अपर्णा खुलकर सपा से बेदखल किए गए ससुर शिवपाल यादव के समर्थन में बोलती दिखाई पड़ती थीं लेकिन अब जब शिवपाल ने अखिलेश को ही नया 'नेताजी' मान लिया है, तब अपर्णा ने बीजेपी का दामन थाम लिया.
  • ये सांप्रदायिक उन्माद की घड़ी है, पहरुए सावधान रहना
    प्रियदर्शन
    बहरहाल, यह सावधान रहने की घड़ी है. जातिगत समीकरण की काट में धार्मिक उन्माद को लगातार दी जा रही हवा फिर से माहौल प्रदूषित कर सकती है. जबकि इन चुनावों में एक सकारात्मक चुनाव का सवाल फिलहाल काफ़ी चुनौती भरा है- यूपी के लिए भी और बाक़ी राजनीति के लिए भी.
  • भगवंत मान ही क्यों बने पंजाब में AAP के CM उम्मीदवार?
    शरद शर्मा
    अरविंद केजरीवाल ने पंजाब की जनता की राय का हवाला देकर भगवंत मान को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के लिए सबसे उपयुक्त बताया है लेकिन भगवंत मान रायशुमारी से पहले ही आम आदमी पार्टी और उसके मुखिया अरविंद केजरीवाल की पहली पसंद बन गए थे. आइए जानते हैं कि आखिर कैसे भगवंत मान आम आदमी पार्टी का पंजाब में मुख्यमंत्री चेहरा बने.
  • पंजाब में कांग्रेस का CM चेहरा होंगे चरणजीत सिंह चन्नी?
    आदेश रावल
    पंजाब की राजनीति में हमेशा बड़े चेहरों का वर्चस्व रहा है. सुरजीत सिंह बरनाला, प्रताप सिंह कैरों , बेअंत सिंह ,प्रकाश सिंह बादल, कैप्टन अमरिन्द्र सिंह, सुखबीर सिंह बादल और उसी राह पर अब पंजाब के 100 दिन के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भी चल रहे है. किसी ने नहीं सोचा था कि इतने कम समय में चरणजीत सिंह पंजाब की जनता के अलावा प्रदेश के बाहर भी इतने लोकप्रिय हो जाएंगे.
  • विराट की एक बड़ी गलती..और देखते-देखते सबकुछ बदल गया!
    मनीष शर्मा
    अब यहां से कोहली के लिए आगे की यात्रा आसान बिल्कुल भी नहीं होने जा रही. उनके लिए खेल में मन को "खुली आंखों" से रमाना आसान नहीं होगा. लेकिन अगर आज जहां कोहली खड़े हैं, उसके लिए वह खुद ही सबसे ज्यादा दोषी हैं!
  • शायद 'दादागिरी' समझ नहीं पाए विराट कोहली
    संजय किशोर
    Virat Kohli Innings : एक समय हर 4 में से 1 मैच में शतक लगाने वाले बल्लेबाज़ के साथ बीसीसीआई का ऐसा बर्ताव बिल्कुल ग़लत है. विराट कोहली में अब भी बहुत क्रिकेट बाक़ी है...
  • योगी आदित्यनाथ के अयोध्या से चुनाव नहीं लड़ने के ऐलान के साथ पीएम मोदी का संदेश स्पष्ट 
    स्वाति चतुर्वेदी
    योगी के चुनाव का प्रबंधन करने वाले कुछ निष्ठावान नेताओं ने कहा, अगर महाराज पूर्वांचल से चुनाव लड़ते हैं तो इसका पूरे क्षेत्र में बहुत अच्छा असर होगा. गोरखपुर सदर सीट योगी आदित्यनाथ के लिए संभवतः सबसे सुरक्षित सीट है और इससे उनके लिए पश्चिमी यूपी में बेरोकटोक चुनाव प्रचार करने के लिए आजादी होगी.
  • जिस पेशे को अपने पसीने से कमाल ख़ान ने सींचा वो अब उनसे वीरान हो गया...
    रवीश कुमार
    हज़ार दुखों से गुज़र रही भारत की पत्रकारिता का दुख आज हज़ार गुना गहरा लग रहा है. जिस पेश को अपने पसीने से कमाल ख़ान ने सींचा वो अब उनसे वीरान हो गया है. कमाल ख़ान हमारे बीच नहीं हैं. हम देश और दुनिया भर से आ रही श्रद्धांजलियों को भरे मन से स्वीकार कर रहे हैं. आप सबकी संवेदनाएं बता रही हैं कि आपके जीवन में कमाल ख़ान किस तरीके से रचे बचे हुए थे. कमाल साहब की पत्नी रुचि और उनके बेटे अमान इस ग़म से कभी उबर तो नहीं पाएंगे लेकिन जब कभी आपके प्यार और आपकी संवेदनाओं की तरफ उनकी नज़र जाएगी, उन्हें आगे की ज़िंदगी का सफर तय करने का हौसला देगी. उन्हें ग़म से उबरने का सहारा मिलेगा कि कमाल ख़ान ने टीवी की पत्रकारिता को कितनी शिद्दत से सींचा था. एनडीटीवी से तीस साल से जुड़े थे. एक ऐसे काबिल हमसफर साथी को अलविदा कहना थोड़ा थोड़ा ख़ुद को भी अलविदा कहना है. 
  • सबके हिस्से के अपने
    अनुराग द्वारी
    कमाल सर की कहानियां में जो सब्र था वो उनकी शख्सियत में भी था. बात में भी कभी हड़बड़ी नहीं आराम से जो पूछा, जैसी मदद मांगी उन्होंने कभी मना नहीं किया. कई बार उनके साथ लाइव करने पर उनको सुनना लंबा लगा लेकिन बोझिल नहीं हर एक शब्द उनकी समझ, लगन, अध्ययन में पिरोया हुआ.  
  • तहज़ीब की एक अलग किताब की तरह थे कमाल खान
    रवीश कुमार
    कमाल खान के बारे में मैं रात तक बोल सकता हूं. जितनी शिद्दत से और समझदारी से उन्‍होंने अयोध्‍या की रिपोर्टिंग की है पिछले 20-25 साल में तो सब जाकर देखने लायक है कि वे किस तरह के हिंदुस्‍तान के बारे में आवाज दे रहे थे.
  • अब कोई दूसरा कमाल ख़ान नहीं होगा
    रवीश कुमार
    वे अक्खड़ भी थे क्योंकि अनुशासित थे. इसलिए ना कह देते थे. वे हर बात में हां कहने वाले रिपोर्टर नहीं है. कमाल ख़ान का हां कह देने का मतलब था कि न्यूज़ रूम में किसी ने राहत की सांस ली है. वे नाजायज़ या ज़िद से ना नहीं कहते थे बल्कि किसी स्टोरी को न कहने के पीछे के कारण को विस्तार से समझाते थे.
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