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विचार
  • उद्धव ठाकरे की अगली परीक्षा सितम्बर महीने में होगी
    तो आखिर देवेंद्र फडणवीस को अपनी मंजिल मिल ही गई है. पिछली बार वो महज 80 घंटे के लिए ही बतौर मुख्यमंत्री सत्ता पर काबिज रह पाए. लेकिन इस अपमान के तीन साल बाद उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी उद्धव ठाकरे को बाहर का रास्ता दिखा दिया.
  • इस्तीफा देना चाहते थे भावुक उद्धव, लेकिन शरद पवार ने दी यह सलाह...
    जिस शिवसेना की स्थापना और नेतृत्व ठाकरे परिवार ने की थी वो अब शिंदेसेना में बदल गई है. जाहिर है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और शिवसेना के सुप्रीमो उद्धव ठाकरे का विधायकों और राजनीतिक राजधानी पर पकड़ कमजोर होती जा रही है. "ठाकरे सेना" अब एकल अंकों में सिमट गई है.
  • सरफ़राज़ ख़ान की अजीब दास्तान
    बात 13 साल पुरानी है. साल 2009 में 12 साल के एक बच्चे ने इंटर स्कूल प्रतियोगिता में रिज़वी स्प्रिंगफ़ील्ड स्कूल के लिए 439 रन बनाए. सचिन तेंदुलकर के हैरिस शिल्ड में बनाए रिकॉर्ड को तोड़ कर बच्चा सुर्खियों में आ गया था.
  • उद्धव की सरकार, गई...गई…या बच गई…
    रवीश कुमार
    देश में छाया सेना का टॉपिक पीछे जाता है और शिवसेना का टॉपिक आगे आता है. बात हो रही थी कि अग्निवीर से सेना कमज़ोर हो सकती है और टूटने लगी शिव-सेना. गिनती होने लगी कि शिंदे के साथ कौन-कौन है, कितने हैं.
  • महाराष्ट्र में महाभारत- ये लड़ाई शिव सेना में नंबर 1 और नंबर 2 के बीच है
    मनोरंजन भारती
    क्या एक बार फिर शरद पवार संकट मोचक की भूमिका में होंगे क्योंकि सबको मालूम है कि अघाड़ी की सरकार उन्हीं की बनाई हुई है और वही इसके चाणक्य और भीष्म पितामह हैं.
  • महाराष्ट्र में 'ऑपरेशन कमल' : पर्दे के पीछे की हकीकत
    इस मौजूदा संकट में शरद पवार की भूमिका निर्विवाद रूप से अहम है. आखिरकार वह शरद पवार ही थे, जिन्होंने शिवसेना, कांग्रेस और अपनी खुद की NCP की अप्रत्याशित साझेदारी से महाराष्ट्र सरकार का निर्माण किया था. इतना ही नहीं, उद्धव ठाकरे और BJP की 25 साल से चली आ रही 'युति' (गठबंधन) को भी तोड़ डाला था.
  • अनंत फायदों का अग्निपथ, Keep It Up, Keep It Up
    रवीश कुमार
    पूरा रविवार यह बताने में गुजर गया कि अग्निवीर को सेना में क्या-क्या मिलेगा और सेना के बाहर क्या-क्या मिलेगा. वायु सेना के बाद थल सेना ने भी अग्निवीर की भर्ती का नोटिफिकेशन निकाल दिया. यानी सरकार इस योजना पर स्पष्ट तरीके से बढ़ चुकी है. सोमवार को जारी सेना के नोटिफिकेशन में साफ-साफ बताया गया है कि अग्निवीर को क्या-क्या मिलेगा और क्या-क्या नहीं मिलेगा. रविवार की प्रेस कांफ्रेंस में सैन्य मामलों के विभाग के अतिरिक्त सचिव,लेफ्टिनेंट जनरल अनिल पुरी ने साफ-साफ कहा था कि सेवा शर्तों में अग्निवीरों के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा.
  • 'अग्निवीर' के फायदे तो हैं लेकिन फिलहाल इस योजना को निलंबित कर देना चाहिए...
    आम तौर पर भारतीय राजनीति की हलचल से सशस्त्र बल परे होते हैं लेकिन फिर भी वो एक बड़े विवाद में फंस गए हैं. पूरे देश में उम्मीदवारों ने जिस तरह से अपने गुस्से का इजहार किया उससे भर्ती नीति की चमक औऱ प्रतिभा पर एक बड़ा सवालिया निशान लग गया है.
  • बीते 4-5 साल से नफरती बयानबाजी की बाढ़ आई, पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
    सुभाषिनी अली
    नूपुर शर्मा का पक्ष लेने वाले अब कह रहे हैं कि उस पर तो कार्रवाई हुई है लेकिन हिन्दूओ की भावनाओं को आहत करने वालों के खिलाफ ऐक्शन क्यों नहीं हो रही है. सरकार को इसका जवाब देना चाहिए.
  • 'अग्निपथ' ने नीतीश और उनके सुशासन की पोल खोलकर कैसे रख दी...
    मनीष कुमार
    भाजपा नेताओं के अनुसार नीतीश कितनी भी शिष्टाचार की बात कर लें, लेकिन उनमें इतना दंभ भरा है कि वो अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझते. फिलहाल नीतीश को साथ रखना इन अपमानजनक घटनाओं के बाद भी भाजपा की मजबूरी है और इस कड़वे सत्य के सामने सब चुप हो जाते हैं.
  • 'अग्निपथ' पर नीतीश ने सहयोगी BJP के सामने रुख किया साफ
    आपसी मनमुटाव और सावर्जनिक छींटाकशी एक आम सी बात है. नीतीश कुमार ने तो पिछले दिनों अमित शाह के उस बयान का भी मजाक बनाया था जिसमें उन्होंने इतिहास के दोबारा और जरूर लिखे जाने की बात कही थी.
  • आक्रोश का अग्निपथ, शांत हो जाओ अग्निवीर, शांत हो जाओ अग्निवीर
    रवीश कुमार
    अग्निपथ योजना आ चुकी है और रहेगी. युवाओं को हिंसा का रास्ता छोड़ना पड़ेगा. अभी तक किसी ने उनकी पहचान कर उनके घर पर बुलडोज़र चलाने की बात नहीं की है, यह कम बड़ी बात नहीं है.
  • 'अग्निपथ' योजना के लिए पूर्व वरिष्ठ सेना अधिकारी के 5 सुझाव
    एक राष्ट्र को अपने फौज के कर्मियों के साथ कभी समझौता नहीं करना चाहिए. आखिर ये फौजी ही सशस्त्र बलों की रीढ़ होते हैं. इस तरह की धारणा को रोकने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उन्हें राजकोष पर बोझ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि कच्चे हीरे के रूप में देखा जाए...
  • विरोध में भड़के युवा, बिहार में BJP दफ्तरों पर हमला
    रवीश कुमार
    क्या सरकार को कृषि कानूनों की तरह अग्निपथ योजना वापस लेनी पड़ेगी? जिस तरह से हिंसा की ख़बरें आ रही हैं, चिन्ता में डालने वाली हैं.
  • एक अग्निपथ और कई सुलगते सवाल
    प्रियदर्शन
    पहली बात तो यह कि सेना में भर्ती की एक योजना का नाम 'अग्निपथ' क्यों? इसे सैन्यपथ, सुरक्षा पथ, वीरपथ, साहसपथ जैसे कई नाम दिए जा सकते थे. संभव है योजनाकारों को लगा होगा कि 'अग्निपथ' एक आकर्षक नाम है जिसकी बदौलत युवाओं को सेना की ओर आकृष्ट किया जा सकता है.
  • अग्निपथ अग्निपथ, भरी जवानी में भूतपूर्व होने की अभूतपूर्व योजना
    रवीश कुमार
    यही समझना है. जो जोश सेना से राजनीति में आता था, अब धर्म से आने लगा है. पहले सेना के नाम पर कई गलत चीज़ों को सही बताया गया, अब इसकी जगह धर्म की रक्षा ने ले ली है.धर्म के नशे में डूबा समाज किसी अत्याचार को गलत नहीं मानता. अब वह राजनीति के ज़रिए एक धर्म राष्ट्र का सपना देखने लगा है.
  • देह पर लाठी, घर पर बुलडोज़र
    रवीश कुमार
    लोकतंत्र की यही ख़ूबी है. अदालत की कार्यवाहियों में देरी से निराशा होती है तो उम्मीद का आखिरी दरवाज़ा भी अदालत ही है. हर तरफ से जब निगाहें थक जाती हैं तब अदालत की तरफ ही उठती हैं. अदालत आत्मा है. आत्मा की अंतरात्मा है. अंतरात्मा में परमात्मा हैं और परमात्मा में सांत्वना की अभी हम हैं. केवल एक इमारत और उसमें आते-जाते लोगों से अदालत की कल्पना करने वाले भी नहीं जानते कि अदालत किन चीज़ों से बनती है.
  • बुलडोजर का इंसाफ, अदालत न अपील, दलील न वकील
    रवीश कुमार
    नूपुर शर्मा का सर कलम करने की मांग करने वालों को अदालत की जरूरत नहीं रही, किसी जावेद का घर बुलडोजर से ढहा देने पर ख़ुश होने वालों को भी अदालत की ज़रूरत नहीं रही. यह सही वक्त है कि भारत की अदालतें तय कर लें कि उनकी ज़रूरत रही या नहीं रही. क्या हर बार ये संयोग ही होता है कि प्रदर्शन या हिंसा के बाद किसी को तुरंत ही मास्टरमाइंड बताकर अतिक्रमण के नाम पर उसका घर गिराया जाने लगता है? जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने तो बकायदा हर जिले में खुफिया तंत्र और उसके संचालन के लिए एक विस्तृत दिशानिर्देश जारी किया था, बड़े अफसर की जवाबदेही तय की थी, ताकि भीड़ की हिंसा रोकी जा सके. इस गाइडलाइन के हिसाब से कितने बड़े अफसरों के खिलाफ कार्रवाई होती है?
  • यह हमारी शर्म का इम्तिहान है... 
    प्रियदर्शन
    ऐसा लग रहा है कि सांप्रदायिकता की आंधी में जैसे सब कुछ उड गया है. इस देश में घरों और दिलों के भीतर इतने सूराख हैं कि हम सब कुछ तोड़ने पर तुले हैं. जिस टूट पर हमें दुखी होना चाहिए, उस पर ताली बजा रहे हैं.
  • मेडल जीता 2019 में, कब मिलेंगे इनाम के पैसे?
    विमल मोहन
    कोच जगदीश कहते हैं कि अब भी खेलों को लेकर लाल फ़ीताशाही ख़त्म नहीं हुई है. वो कहते हैं, "अधिकारी समझते नहीं हैं कि जो इनाम के पैसे होते हैं उसकी खिलाड़ियों और कोच को कितनी ज़रूरत होती है. ये लड़कियां गरीब घरों से आती हैं. इनाम के पैसे मिलते हैं तो इनके खाने और न्यूट्रिशन पर खर्च होता है. आप वक्त पर पैसे न दें तो क्या फ़ायदा?
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