मध्यपूर्व एशिया में युद्ध के दौरान बढ़ी हुई कच्चे तेल की कीमतों का बोझ आम लोगों पर ना पड़े इसके लिए भारत सरकार ने पहले 78 दिनों के दौरान सरकारी तेल कंपनियों को आर्थिक मदद के तौर पर करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये दिए. सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इसमें पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती भी शामिल थी, जिसके जरिए भारत सरकार ने आसमान छूती अंतरराष्ट्रीय कीमतों के समय तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे को कम करने के लिए टेक्सेशन रेवेन्यू छोड़ने का फैसला किया था.
हालांकि 78 दिनों तक सरकारी तेल कंपनियों को हो रहे नुकसान की भरपाई के बाद वित्त मंत्रालय ने तय किया कि इससे ज्यादा फाइनेंसियल सपोर्ट सिर्फ एक सेक्टर को देना उचित नहीं होगा.
कीमतें बढ़ी लेकिन अब भी रोजाना 652 करोड़ का नुकसान
सूत्रों के मुताबिक, इसके बाद ही सरकार ने तय किया कि सरकारी तेल कंपनियों को कच्चे तेल और गैस की बढ़ती कीमतों का कुछ हिस्सा आम उपभोक्ताओं पर ट्रांसफर करना होगा. इस फैसले के बाद से ही सरकारी तेल कंपनियों ने 15 मई से पेट्रोल-डीजल और LPG के कीमतों में बढ़ोतरी करना शुरू किया.
एक वरिष्ठ सरकारी प्रतिनिधि के मुताबिक, पिछले कुछ हफ्तों के दौरान पेट्रोल, डीजल और LPG के कीमतों में बढ़ोतरी के बाद भी आज सरकारी तेल कंपनियों को हर दिन करीब 652 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हो रहा है.
पेट्रोलियम मंत्रालय की पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2026 के दौरान कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की औसत कीमत 114.48 डॉलर और मई 2026 के दौरान 106.23 डॉलर प्रति बैरल के ऊंचे स्तर पर रही थी.
आज भी कच्चे तेल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 93-94 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है. इस दौरान LPG की कीमत भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में 46% से ज्यादा महंगी हुई है.
RBI गवर्नर ने खतरे को लेकर किया आगाह
पिछले शुक्रवार को RBI गवर्नर ने इस खतरे के प्रति आगाह करते हुए कहा था, "वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिति खराब हो रही है. आपूर्ति शृंखलाओं में लंबे समय तक व्यवधान और ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमतों का विकास दर और महंगाई दर दोनों पर असर पड़ने की आशंका है".
RBI गवर्नर के मुताबिक, मौजूदा वित्तीय साल के दौरान भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.6% रहने का अनुमान है, जबकि पहले RBI ने वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.9% का अनुमान जारी किया था.
मोनेटरी पॉलिसी स्टेटमेंट जारी करते हुए कहा RBI गवर्नर ने कहा था कि पिछले दो महीनों के दौरान कच्चे तेल की कीमतें (भारतीय बास्केट) औसतन 110 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रही हैं. भारत में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का पेट्रोल और डीजल की रिटेल कीमतों पर असर मई से पड़ना शुरू हो गया है. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष के लिए RBI ने सीपीआई मुद्रास्फीति दर 5.1% रहने का अनुमान जताया है, जो पहले अनुमानित दर से 50 बेसिस पॉइंट अधिक है.
15 मई से चार बार बढ़ी पेट्रोल-डीजल की कीमतें
भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल और करीब 60% LPG अंतरराष्ट्रीय बाजार से आयात करता है. इसमें से करीब 40% कच्चा तेल और 90% LPG का आयात स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए भारत पहुंचता था. इसकी वजह से पहले ही भारत में 15 मई 2026 के बाद चार बार पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाई जा चुकी हैं.
पिछले ही रविवार को सरकारी तेल कंपनियों ने घरेलू LPG की कीमतें 29 रुपये बढ़ाने का फैसला किया था. भारत अपनी जरूरत का 60% LPG दुनियाभर के बाजारों से आयात करता है, जिसका मध्यपूर्व एशिया में युद्ध शुरू होने से पहले करीब 90% स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से आता था.
मध्यपूर्व एशिया में संकट के असर से निपटने के लिए भारत सरकार ने तेल कम्पनियों के साथ मिलकर LPG के आयात स्रोतों में विविधता लाने का प्रयास किया है और अब दुनिया के नए बाजारों से LPG का स्टॉक आयात किया जा रहा है. हालांकि इसकी वजह से LPG के आयात का खर्च काफी बढ़ गया है.
पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक, रविवार को कीमतों में बढ़ोतरी के बाद भी हर घरेलू LPG सिलिंडर पर तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी 600 से 700 रुपये है. एक सिलेंडर सप्लाई करने पर खर्च करीब 1,600 से 1,700 रुपये तक बढ़ गया है, क्योंकि एलपीजी के लिए सऊदी सीपी बेंचमार्क में जनवरी से करीब 50% की वृद्धि हुई है.
सरकारी आकड़ों के मुताबिक, पिछले एक साल में घरेलू एलपीजी पर अंडर-रिकवरी बढ़कर 60,000 करोड़ रुपये होने का अनुमान है, जो एक साल पहले 41,338 करोड़ रुपये थी.
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