पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक जीत हासिल करने के बाद अब बीजेपी ने अगले साल की शुरुआत में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए कमर कस ली है. इनमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में बीजेपी की सरकार है जबकि पंजाब में बीजेपी कमजोर है. पार्टी चार राज्यों में सरकार की वापसी को लेकर आश्वस्त है. उसने पंजाब में सत्ता में आने के लिए पूरी ताकत झोंकने का फैसला किया है.
इसकी कमान खुद गृह मंत्री अमित शाह संभाल रहे हैं. इससे पहले पश्चिम बंगाल में उन्होंने पार्टी के चुनाव अभियान की अगुवाई की थी और राज्य में पहली बार पार्टी को सत्ता में लाने में बड़ी भूमिका निभाई थी.
सूत्रों के अनुसार इस महीने शाह ने पंजाब के बीजेपी नेताओं की एक बैठक बुलाई है. उनसे फीडबैक लेने के बाद राज्य में ड्रग्स के खिलाफ यात्रा को अंतिम रूप दिया जाएगा. खुद शाह इसकी शुरुआत करने जा रहे हैं.
बीजेपी पंजाब में परंपरागत रूप से शहरी क्षेत्रों में मजबूत रही है. ग्रामीण इलाकों में उसका जनाधार नहीं रहा है और शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन इसकी भरपाई करता आया है. हालांकि बीजेपी ने तय किया है कि इस बार वह बिना अकाली दल से समझौता किए ही अकेले चुनाव मैदान में उतरेगी. राज्य की सभी 117 सीटों पर पार्टी अपने उम्मीदवार खड़े करने जा रही है.
ग्रामीणों को साधने के लिए क्या है प्लान?
बीजेपी ने शहरी क्षेत्रों में अपने जनाधार को और मजबूत करने के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तार की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है. इसी के तहत कांग्रेस से आए केवल सिंह ढिल्लों को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. वे जट सिख हैं. इस तरह पार्टी मालवा बेल्ट के ग्रामीण और किसान क्षेत्र को संदेश देना चाहती है.
बीजेपी को इस बात का एहसास है कि कृषि कानूनों के चलते पंजाब किसानों की नाराजगी अभी तक दूर नहीं हो सकी है. इसलिए पार्टी ने सीधे गांवों और किसानों के घरों तक जाने का अभियान चलाया है. जिसमें केंद्र सरकार की कल्याणकारी और किसानों के लिए चलाई जा रही योजनाओं का विवरण दिया जाएगा और लाभार्थियों से संपर्क साधा जाएगा. पार्टी संगठन को मजबूत करने के लिए अभियान चला रही है जिसमें बूथ स्तर पर पन्ना प्रमुखों की नियुक्ति और प्रशिक्षण शामिल है.
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रवनीत सिंह बिट्टू को मिलेगी अहम जिम्मेदारी!
केंद्रीय रेलवे राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू का राज्य सभा कार्यकाल 21 जून को खत्म हो रहा है. पार्टी ने उन्हें दोबारा राज्य सभा न भेजने का फैसला किया है. सूत्रों के अनुसार वे 21 जून से पहले मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे देंगे. पार्टी उन्हें पंजाब में सक्रिय करेगी. वे विधानसभा का चुनाव भी लड़ेंगे. हालांकि वे मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं होंगे.

अमित शाह और रवनीत सिंह बिट्टू. (फाइल फोटो- IANS)
ढिल्लों को अध्यक्ष बनाने से नाराज कैप्टन अमरिंदर सिंह ने दिल्ली आकर अमित शाह से मुलाकात की थी. इसके बाद वे अपनी नाराजगी की खबरों को खारिज कर चुके हैं. पार्टी महासचिव डॉ. जगमोहन राजू भी नाराज हैं जिन्होंने इस्तीफा दे दिया है. उनसे भी पार्टी नेतृत्व बातचीत कर रहा है.
बीजेपी ने मिशन पंजाब के तहत ही राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ को राज्य सभा भेजने का फैसला किया है. उन्हें केंद्रीय मंत्रिपरिषद में जगह मिलने की भी चर्चा है. इसी रणनीति के तहत दिल्ली में पंजाबी अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा को बनाया गया. साथ ही, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को भी पंजाब पर ध्यान देने को कहा गया है जो कई कार्यक्रमों में पगड़ी पहने नजर आने लगे हैं. शहरी इलाकों में आरएसएस के स्वयंसेवकों को सक्रिय किया जा रहा है.
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पंजाब में कितना है बीजेपी का जनाधार?
पिछले लोक सभा चुनाव में बीजेपी पंजाब में कोई सीट नहीं जीत सकी थी. हालांकि उसे 18.56 प्रतिशत वोट मिले थे. उसने अकाली दल को भी पीछे छोड़ दिया था और वह राज्य में तीसरे नंबर की पार्टी बन गई थी. बीजेपी 23 विधानसभा सीटों में पहले नंबर पर आई. पांच सीटों पर उसकी हार पांच हजार वोटों से कम और दस सीटों पर दस हजार वोटों से कम हुई.
इस तरह राज्य की 117 में से 38 सीटों पर पिछले लोक सभा चुनाव में बीजेपी ने मजबूत उपस्थिति दर्ज की जो कि बहुमत के आंकड़े 59 से केवल 21 सीटें दूर है. बीजेपी को इन्हीं आंकड़ों में अपनी संभावना दिख रही हैं.
पार्टी का मानना है कि चारकोणीय मुकाबले में जीत हार का अंतर काफी कम होता है और ऐसे में अपने जनाधार का विस्तार कर बीजेपी जीत के नजदीक पहुंच सकती है.
हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी केवल दो विधानसभा सीटें पठानकोट और अबोहर ही जीत सकी थी. उसे केवल 6.6 प्रतिशत वोट मिले थे. तब आम आदमी पार्टी की आंधी में उसके पैर उखड़ गए थे.
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बाहरी नेताओं को नहीं लेगी बीजेपी
बीजेपी ने तय किया है कि वह दूसरी पार्टियों खासतौर से आम आदमी पार्टी से नेताओं को नहीं लेगी. बीजेपी नेताओं के अनुसार आप विधायकों के खिलाफ जबरदस्त नाराजगी है और उन्हें साथ लाकर पार्टी एंटी इंकमबेंसी नहीं लेना चाहती. बीजेपी ने हाल के पश्चिम बंगाल चुनाव में भी टीएमसी के नेताओं को पार्टी में लाकर टिकट न देने का फैसला किया था जिसका लाभ उसे मिला.

बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन और अमित शाह. (फाइल फोटो-IANS)
क्या है बीजेपी का प्लान?
बीजेपी के मुताबिक राज्य में ड्रग्स, बिगड़ती कानून व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा बड़े मुद्दे हैं. पार्टी सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी पर इन सभी मोर्चों पर विफल होने का आरोप लगाते हुए राज्यव्यापी अभियान चलाएगी. बॉर्डर स्टेट होने के कारण पंजाब की सरहदों की सुरक्षा और उसके प्रभाव को भी मुद्दा बनाया जाएगा. साथ ही राज्य में बढ़ते धर्मांतरण को भी प्रमुखता से उठाया जाएगा.
बीजेपी का संगठन ठीक वैसे ही सक्रिय किया जाएगा जैसे बंगाल के चुनाव में किया गया. इसके लिए देश भर से बीजेपी कार्यकर्ताओं को झोंका जाएगा. बीजेपी सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए दलित नेताओं को आगे करेगी.
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निकाय चुनाव के प्रदर्शन से बढ़ा हौंसला
हाल के स्थानीय निकायों के चुनाव में प्रदर्शन से भी बीजेपी के हौंसले बुलंद हैं. बीजेपी ने 2021 में जीते गए 49 वार्डों की तुलना में इस बार 170 से अधिक वार्डों पर जीत दर्ज की. हालांकि कुल वार्डों की संख्या के हिसाब से बीजेपी पांचवें स्थान पर रही. पर उसे सबसे बड़ी सफलता अबोहर नगर निगम में मिली. यहां बीजेपी ने 50 में से 28 सीटों पर जीत हासिल करते हुए बहुमत हासिल किया.
वहीं आम आदमी पार्टी 20 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही. अबोहर के साथ मोहाली, होशियारपुर, फतेहगढ़ साहिब, मानसा, पटियाला और फाजिल्का जिलों की नगर परिषदों और नगर पंचायतों में बढ़त बनाने के साथ-साथ बीजेपी ने बठिंडा नगर निगम में भी अपना खाता खोला. बठिंडा किसानों के संगठनों और कृषि-राजनीति का गढ़ माना जाता है. किसान आंदोलन की जड़े जमा चुके मानसा जिले की मानसा नगर परिषद में बीजेपी ने 6 सीटें जीत कर अपना आत्मविश्वास बढ़ाया.
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