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झारखंड में दिलचस्प हुआ 2 सीटों पर राज्यसभा चुनाव, क्या फिर से दोहराएगा 2008 का इतिहास?

परिमल नाथवानी की एंट्री ने झारखंड के इस सीधे-साधे दिख रहे राज्यसभा चुनाव को एक हाई-वोल्टेज पॉलिटिकल थ्रिलर में तब्दील कर दिया है. यह सिर्फ दो सीटों को भरने का चुनाव नहीं है, बल्कि झारखंड विधानसभा के भीतर बहने वाली अंडरकरंट राजनीति का लिटमस टेस्ट है.

झारखंड में दिलचस्प हुआ 2 सीटों पर राज्यसभा चुनाव, क्या फिर से दोहराएगा 2008 का इतिहास?
झारखंड में दिलचस्प हुआ 2 सीटों पर राज्यसभा चुनाव

झारखंड की 2 राज्यसभा सीटों के लिए होने वाला मुकाबला बेहद रोमांचक मोड़ पर पहुंच गया है. तीन दिग्गज उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से सियासी पारा पूरी तरह चढ़ चुका है. झारखंड मुक्ति मोर्चा से बैजनाथ राम, कांग्रेस से प्रणव झा और निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में परिमल नाथवाणी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. इस दो राज्यसभा सीट को लेकर जारी सियासी जंग में झारखंड मुक्ति मोर्चा जहां फीलगुड में है, वहीं कांग्रेस की चिंता थोड़ी बढ़ी हुई है. इसका कारण है निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नथवानी. बता दें कि साल 2008 में झामुमो के 17 विधायकों के बावजूद उनके उम्मीदवार को महज 8 वोट मिलना और नाथवानी का बाजी मार जाना, आज भी सूबे की राजनीति का सबसे बड़ा क्रॉस वोटिंग चैप्टर है. 2014 में भी उन्होंने बिना टक्कर के दिल्ली का टिकट कटाया था.

अभी महागठबंधन के चेहरे पर मुस्कान

81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में सत्ताधारी महागठबंधन के चेहरों पर फिलहाल मुस्कान है, लेकिन इतिहास को देखते हुए दिल की धड़कनें बढ़ी हुई हैं. सैद्धांतिक रूप से महागठबंधन के पास अपने दोनों उम्मीदवारों को जिताने के लिए पर्याप्त और सुरक्षित संख्या बल (56 वोट) है. झामुमो अपने 28 वोट देने के बाद भी 6 अतिरिक्त वोट कांग्रेस को ट्रांसफर कर सकता है. जिससे कांग्रेस के भी 28 वोट पूरे हो जाते हैं, लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है और परिमल नाथवाणी इसी संभावना का दूसरा नाम हैं.

  • महागठबंधन: कुल 56 विधायक, झामुमो के 34 वोट, 28 वोट के बाद छह अतिरिक्त वोट
  • कांग्रेस के 16 वोट, झामुमो सहयोग से 28 पूरे
  • राजद के चार वोट महागठबंधन के पाले में
  • भाकपा माले के दो वोट, महागठबंधन के पाले में
  • NDA के कुल 24 वोट. इसमें भाजपा के 21 आजसू, जदयू और लोजपा के एक-एक वोट सभी नाथवाणी के साथ
  • अन्य : JLKM के एक वोट, फिलहाल तटस्थ

8 जून को नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद परिमल नाथवाणी का आत्मविश्वास देखने लायक था. उन्होंने एनडीटीवी से बात करते हुए कहा था कि मैं झारखंड में पहले भी काम कर चुका हूं. इस बार मौका मिलेगा तो और ज्यादा काम करूंगा. मेरे संबंध सभी राजनीतिक दलों से हैं. मैं कभी बाहरी नहीं था, झारखंड मेरी कर्मभूमि है. मैं सबके साथ मिलकर काम करने वाला हूं. नामांकन से पहले मैं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिला था, कांग्रेस नेताओं से मिला था और निर्दलीय विधायकों से भी मिला था. मैं यहां सबको जानता हूं. पहले भी मैं किसी पार्टी के लेवल से नहीं आया था, बल्कि दूसरे लोगों ने भी मुझे समर्थन दिया था.

नाथवाणी ने कहा कि मैं अपनी जीत के प्रति 100 परसेंट कांफिडेंट हूं. नाथवाणी का यह बयान साफ संकेत देता है कि उनके सियासी संपर्क केवल एनडीए तक सीमित नहीं हैं, बल्कि महागठबंधन के भीतर भी उनकी पैठ है. 

नाथवानी को भाजपा के समर्थन पर कांग्रेस का हमला

इधर भाजपा द्वारा निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को समर्थन दिए जाने पर कांग्रेस ने तीखा हमला बोला है. प्रदेश कांग्रेस के मीडिया प्रभारी राकेश सिन्हा ने एनडीटीवी से बात करते हुए कहा कि भाजपा ने राज्यसभा चुनाव को लोकतंत्र का नहीं, बल्कि धनबल का खेल बना दिया है. राकेश सिन्हा ने आरोप लगाया कि भाजपा सिद्धांतों और विचारधारा की राजनीति की बात करती है, लेकिन राज्यसभा चुनाव में उसका असली चेहरा सामने आ गया है. उन्होंने कहा कि पार्टी जनसंघर्ष से निकले नेताओं को आगे बढ़ाने के बजाय प्रभावशाली और संसाधन संपन्न लोगों को प्राथमिकता दे रही है.

वहीं बीजेपी विधायक दल के नेता और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा कि भाजपा ने परिस्थितियों को देखते हुए परिमल नाथवाणी को समर्थन देने का निर्णय लिया है. उन्होंने कहा कि भाजपा के पास राज्यसभा सीट जीतने के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं था, इसलिए व्यापक रणनीति के तहत नथवानी का समर्थन किया गया है. मरांडी ने कहा कि परिमल नाथवाणी एक टेस्टेड" व्यक्ति हैं और झारखंड उन्हें पहले भी राज्यसभा सदस्य के रूप में देख चुका है. 

यह चुनाव अब एक बेहद कड़े वैचारिक और रणनीतिक मुकाबले में तब्दील हो चुका है. एक तरफ झारखंड की माटी से उपजा दलित, आदिवासी और स्थानीयता का नैरेटिव है. जिसके दम पर महागठबंधन अपनी एकजुटता का दावा कर रहा है. दूसरी तरफ, एनडीए समर्थित कॉरपोरेट मैनेजमेंट की वो चाणक्य नीति है जो ऐन वक्त पर हवा का रुख बदलने के लिए जानी जाती है. क्या महागठबंधन अपने कुनबे को पूरी तरह एकजुट रखकर नाथवाणी के चक्रव्यूह को तोड़ पाएगा? या फिर परिमल नाथवाणी इतिहास को दोहराते हुए एक बार फिर झारखंड की राजनीति में एक नया और अभूतपूर्व उलटफेर लिख देंगे? जवाब भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि झारखंड राज्यसभा चुनाव की यह जंग अब बेहद रोमांचक और अंतिम क्षण तक सांसें थामने वाली होने जा रही है.

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