21 साल बाद 721 मिलियन व्यूज, बाथरूम में आई 'कजरारे' की धुन, गुलजार ने बताया कैसे बना ऐश-अभिषेक का सुपरहिट गाना

बंटी और बबली फिल्म के गाने 'कजरारे' की प्रेरणा ट्रकों पर लिखे जुमलों और बाथरूम में सूझी एक धुन से मिली थी. यही वजह है कि दो दशक बाद भी इसका जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलता है.

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कैसे बना था ऐश्वर्या राय का कजरारे गाना

बॉलीवुड के इतिहास में कुछ गाने ऐसे होते हैं जो सिर्फ एक फिल्म का हिस्सा बनकर नहीं रह जाते, बल्कि समय के साथ एक पहचान बन जाते हैं. ऐसा ही एक गीत है ‘कजरारे', जिसकी धुन सुनते ही आज भी लोग झूमने लगते हैं. चाहे शादी हो, पार्टी हो या कोई स्टेज शो, यह गाना हर मौके पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है. दिलचस्प बात यह है कि इस सुपरहिट गीत की शुरुआत किसी आलीशान स्टूडियो या बड़ी क्रिएटिव मीटिंग से नहीं, बल्कि सड़कों पर दौड़ते ट्रकों के पीछे लिखे जुमलों से हुई थी. कौन सा है वो गाना, आइए जानते हैं.

बंटी और बबली बबली का गाना 

साल 2005 में रिलीज हुई फिल्म ‘बंटी और बबली' का यह गाना उस दौर का सबसे बड़ा चार्टबस्टर साबित हुआ था. फिल्म में रानी मुखर्जी और अभिषेक बच्चन मुख्य भूमिकाओं में थे, लेकिन जब ‘कजरारे' रिलीज हुआ तो इसकी लोकप्रियता ने फिल्म की कहानी से भी ज्यादा चर्चा बटोरी. ऐश्वर्या राय बच्चन की अदाएं, अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन की मौजूदगी और दमदार संगीत ने इसे एक यादगार बना दिया.

ट्रक से मिला था आइडिया

कम ही लोग जानते हैं कि इस गीत के बोल लिखने वाले मशहूर गीतकार गुलजार को इसकी प्रेरणा उत्तर भारत की सड़कों पर चलने वाले ट्रकों से मिली थी. ट्रकों के पीछे लिखे जाने वाले मजेदार वाक्य, शायरियां और प्यार-मोहब्बत से जुड़े मैसेज अक्सर लोगों का ध्यान खींचते हैं. गुलजार ने इन्हीं आम दिखने वाले शब्दों में एक खास लय और भावना महसूस की. उन्होंने उन भावनाओं को अपने अंदाज में पिरोया और एक ऐसा गीत रच दिया, जो बाद में संगीत प्रेमियों की जुबान पर चढ़ गया.

गुलजार का मानना रहा है कि कविता और गीत सिर्फ किताबों या बड़े विचारों से नहीं जन्म लेते, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में बिखरे छोटे-छोटे अनुभव भी बड़ी रचनाओं की नींव बन सकते हैं. ‘कजरारे' इसकी सबसे बड़ी मिसाल माना जाता है. गाने में आंखों, काजल और इश्क की जो भाषा सुनाई देती है, वह सीधे आम लोगों की दुनिया से जुड़ी हुई महसूस होती है.

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कैसे बना धुन?

जहां गीत के बोलों की कहानी दिलचस्प है, वहीं इसकी धुन बनने का किस्सा भी किसी फिल्मी सीन से कम नहीं. संगीतकार तिकड़ी शंकर-एहसान-लॉय ने इस गाने को कंपोज किया था. एक इंटरव्यू में शंकर महादेवन ने बताया था कि धुन का एक अहम हिस्सा उन्हें उस वक्त सूझा जब वह नहाते हुए शावर के नीचे खड़े थे. अचानक उनके दिमाग में एक नई लय आई और उन्होंने तुरंत उसे नोट किया. बाद में यही धुन ‘कजरारे' की पहचान बन गई.

गाने को शंकर महादेवन, जावेद अली और अनीशा चिनाई ने अपनी आवाज दी थी. तीनों गायकों की ऊर्जा और अलग-अलग अंदाज ने इसे और भी खास बना दिया. रिलीज के बाद यह गाना रेडियो स्टेशनों, म्यूजिक चैनलों और चार्ट्स पर लगातार छाया रहा. उस दौर में जब डिजिटल प्लेटफॉर्म इतने मजबूत नहीं थे, तब भी ‘कजरारे' ने रिकॉर्डतोड़ लोकप्रियता हासिल की थी. इस गीत की सबसे बड़ी ताकत इसकी यूनिवर्सल अपील रही. युवा हों या बुजुर्ग, हर वर्ग के लोगों ने इसे पसंद किया. गाने का संगीत लोकधुनों, कव्वाली और आधुनिक बीट्स का ऐसा मिश्रण था, जो उस समय काफी नया माना गया. यही वजह है कि दो दशक बीत जाने के बाद भी इसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है.

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आज जब बॉलीवुड में हर हफ्ते नए गाने रिलीज होते हैं, तब भी ‘कजरारे' का नाम उन चुनिंदा गीतों में शामिल है जिन्हें लोग बार-बार सुनना पसंद करते हैं. यह सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि क्रिएटिविटी कहीं से भी जन्म ले सकती है. कभी ट्रक के पीछे लिखी एक साधारण लाइन से और कभी बाथरूम में अचानक सूझी एक धुन से. शायद यही वजह है कि ‘कजरारे' आज भी भारतीय संगीत के सबसे यादगार गानों में गिना जाता है.

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