राजनीति केवल सत्ता हथियाने का यांत्रिक खेल नहीं है, बल्कि यह दीर्घकालिक सिद्धांतों और स्पष्ट दर्शन पर आधारित एक सामाजिक अनुबंध है. जब कोई राजनीतिक दल किसी सुदृढ़ विचारधारा की भट्ठी में तपकर निकलता है, तो वह राष्ट्र निर्माण के एक स्पष्ट 'विजन' के साथ आगे बढ़ता है. इसके विपरीत, जब किसी दल का जन्म केवल किसी तात्कालिक घटना, विशेष मुद्दे या समाज में व्याप्त क्षणिक आक्रोश के गर्भ से होता है, तो उसकी बुनियाद हमेशा खोखली होती है. ऐसे दल तात्कालिक रूप से भले ही जनता के मसीहा प्रतीत हों, लेकिन उनका पतन न केवल अवश्यंभावी होता है, बल्कि वह पतन बेहद त्रासद और सिद्धांतों की कब्रगाह पर खड़ा होता है. हालिया राजनीतिक विमर्श में उभरी 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) इसी वैचारिक शून्यता और अवसरवादिता का सबसे ज्वलंत रूपक है, जो इस सत्य की पुष्टि करती है कि बिना जड़ों का पेड़ पहली तेज आंधी में ही अपना संतुलन खो देता है.
तात्कालिक मुद्दों या घटना विशेष के आधार पर बनी कॉकरोच जनता पार्टी जैसे दलों का जन्म अक्सर एक गहरे सामाजिक असंतोष के बीच होता है. जब स्थापित राजनीतिक दल और पारंपरिक संस्थाएं जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरतीं, तब जनता एक ऐसे 'विकल्प' की तलाश करती है जो उन्हें रातों-रात इन विद्रूपताओं से मुक्ति दिला सके. शुरुआत में ये दल अत्यंत पवित्र, क्रांतिकारी और व्यवस्था-परिवर्तक नजर आते हैं. वे बड़े-बड़े दावे करते हैं, पारंपरिक राजनीति के तौर-तरीकों को सिरे से खारिज करते हैं और शुचिता का ऐसा आवरण ओढ़ लेते हैं मानो वे राजनीति के कीचड़ में खिले इकलौते कमल हों. जनता भी अपनी हताशा में इन दावों पर मुग्ध हो जाती है और उन्हें अभूतपूर्व जनसमर्थन सौंप देती है. कॉकरोच जनता पार्टी के साथ भी कुछ ऐसा ही है.
लेकिन यहीं से उस ऐतिहासिक विरोधाभास की शुरुआत होती है, जिसके प्रमाण भारत ही नहीं बल्कि समूचे विश्व के राजनीतिक इतिहास में बिखरे पड़े हैं. किसी एक मुद्दे पर पार्टी बना लेना आसान है, लेकिन एक जटिल और विविध राष्ट्र या प्रदेश का शासन चलाना पूरी तरह से अलग चुनौती है. शासन चलाने के लिए एक समग्र विश्वदृष्टि की आवश्यकता होती है. जब इन घटना-आधारित दलों के हाथों में सत्ता आती है, तो उनके पास अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और सामाजिक न्याय को लेकर कोई स्पष्ट और सुसंगत नीति नहीं होती. चूंकि उनका जन्म 'विरोध' से हुआ है, इसलिए उनका मूल स्वभाव नकारात्मक, अराजक और विध्वंसकारी होता है.
भारत में किसी आंदोलन से जन्मी पार्टियों का क्या है इतिहास
भारतीय राजनीति के आधुनिक इतिहास में इसका सबसे सटीक और जीवंत उदाहरण आम आदमी पार्टी (AAP) है. साल 2011 में 'इण्डिया अगेंस्ट करप्शन' के बैनर तले उपजे एक अभूतपूर्व लोक-आंदोलन की कोख से इस दल का जन्म हुआ था.तत्कालीन व्यवस्था के भ्रष्टाचार के खिलाफ उपजा वह गुस्सा इतना तीव्र था कि उसने पारंपरिक राजनीतिक गणित को ध्वस्त कर दिया.'आप' ने राजनीति बदलने, आंतरिक लोकतंत्र बहाल करने, और जनलोकपाल जैसे मुद्दों को अपना मूल सिद्धांत बनाया. लेकिन जैसे ही आंदोलन एक राजनीतिक दल में बदला और सत्ता की कठोर वास्तविकताओं से उसका सामना हुआ, उसके सिद्धांतों का विसर्जन शुरू हो गया. किसी भी कीमत पर सत्ता में बने रहने और विस्तार करने की चाह ने पार्टी को उन्हीं रास्तों पर चलने के लिए मजबूर किया, जिनका विरोध करके वह आई थी. पुराने सहयोगियों का बाहर होना, आंतरिक लोकतंत्र का खत्म होना, व्यावहारिक राजनीति के नाम पर पारंपरिक दलों से गठबंधन करना और लोकलुभावन मुफ्त योजनाओं के सहारे टिके रहना, यह सब उसी 'कॉकरोच सिंड्रोम' का हिस्सा है, जहां उच्च आदर्शों की बलि देकर केवल 'सर्वाइवल' को ही एकमात्र लक्ष्य बना लिया जाता है.
दुनियाभर में भी ऐसा ही है पैटर्न
विश्व राजनीति का इतिहास भी ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है. इटली का फाइव स्टार मूवमेंट इसका एक अंतरराष्ट्रीय प्रमाण है. एक प्रसिद्ध कॉमेडियन बेप्पे ग्रिलो द्वारा शुरू किया गया यह आंदोलन पूरी तरह से 'एंटी-एस्टेब्लिशमेंट' (स्थापित व्यवस्था विरोधी) और भ्रष्टाचार विरोधी तात्कालिक मुद्दों पर आधारित था. उन्होंने पारंपरिक राजनेताओं को उखाड़ फेंकने का नारा दिया और इंटरनेट आधारित प्रत्यक्ष लोकतंत्र की बात की. जनता ने उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया और वे इटली की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे. लेकिन सरकार बनाने की बारी आई तो उनके पास कोई वैचारिक दिशा नहीं थी. जीवित रहने और सत्ता में बने रहने के लिए उन्होंने पहले धुर-दक्षिणपंथी 'लीग पार्टी' के साथ गठबंधन किया और जब वह टूटा तो धुर-विरोधी वामपंथी 'डेमोक्रेटिक पार्टी' के साथ हाथ मिला लिया. सिद्धांतों की इस सौदेबाजी ने पार्टी को अंदर से खोखला कर दिया और जो पार्टी कभी क्रांति की बात करती थी, वह महज एक अवसरवादी गुट बनकर रह गई.
इसी तरह ग्रीस (यूनान) में सिरिजा पार्टी का उदय 2010 के दशक के आर्थिक संकट और यूरोपीय संघ द्वारा थोपी गई तपस्या के खिलाफ उपजे जन-आक्रोश के कारण हुआ था. उन्होंने नारा दिया था कि वे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के सामने नहीं झुकेंगे. लेकिन जब वे सत्ता में आए, तो वैश्विक आर्थिक वास्तविकताओं और सत्ता के दबाव के आगे उनके सारे क्रांतिकारी सिद्धांत हवा हो गए. जिस पार्टी ने तपस्या विरोधी आंदोलन का नेतृत्व किया था, उसी ने सत्ता में बने रहने के लिए यूरोपीय संघ की और भी कड़ी शर्तों को स्वीकार कर लिया. सिद्धांतों का यह यू-टर्न उनके समर्थकों के लिए एक बड़ा विश्वासघात था, जिसने अंततः पार्टी को पतन के रास्ते पर धकेल दिया. स्पेन की पोडेमोस पार्टी की कहानी भी इससे अलग नहीं है, जो नागरिकों के गुस्से से पैदा हुई लेकिन अंततः पारंपरिक गठबंधन राजनीति का हिस्सा बनकर अपनी धार खो बैठी.
कॉकरोच जनता पार्टी का क्या होगा?
कॉकरोच जनता पार्टी इसी वैश्विक और ऐतिहासिक प्रवृत्ति का चरम रूप है. जब किसी दल के पास कोई रचनात्मक नीति नहीं होती, तो वह जनता का ध्यान भटकाने के लिए निरंतर एक 'आभासी युद्ध' की स्थिति बनाए रखना चाहता है. उनका दर्शन कहता है कि 'व्यवस्था सड़ चुकी है, इसे कुतर डालो.' कॉकरोच को पनपने के लिए गंदगी और अव्यवस्था की आवश्यकता होती है. यदि व्यवस्था पारदर्शी और साफ-सुथरी हो जाएं, तो CJP जैसी पार्टियों की प्रासंगिकता ही खत्म हो जाएगी.
इस पूरी प्रक्रिया की सबसे भयावह परिणति केवल एक दल का वैचारिक पतन नहीं है, बल्कि यह आम जनता की उम्मीदों और लोकतंत्र पर उनके विश्वास की हत्या है. पारंपरिक राजनीतिक दलों से जनता को कोई चमत्कारिक उम्मीद नहीं होती, इसलिए उनका पतन जनता को उतना निराश नहीं करता. लेकिन जब एक ऐसा दल, जो एक पवित्र जन-आंदोलन की कोख से जन्मा हो, वह जब अपने सिद्धांतों से समझौता करता है और उसी भ्रष्ट व्यवस्था का पुर्जा बन जाता है, तो जनता के भीतर एक गहरा निराशावाद पैदा होता है. आम आदमी यह मानने लगता है कि 'इस व्यवस्था का कुछ नहीं हो सकता.' लोकतंत्र के लिए यह निराशावाद एक धीमे जहर के समान है.
संक्षेप में, राजनीति में 'शॉर्टकट' या केवल तात्कालिक भावनाओं की लहर पर लंबी दूरी तय नहीं की जा सकती. त्वरित मुद्दों पर तैरकर लोकप्रियता तो हासिल की जा सकती है, लेकिन वहां टिके रहने और एक राष्ट्र का मार्गदर्शन करने के लिए एक मजबूत वैचारिक रीढ़ की आवश्यकता होती है. जब तक कोई राजनीतिक दल अपनी नीतियों को एक स्पष्ट दर्शन, मानवीय मूल्यों और संस्थागत गरिमा के साथ नहीं जोड़ता, तब तक वह चाहे कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो, अंततः अवसरवादिता के दलदल में ही गिरेगा. लोकतंत्र को केवल 'सर्वाइव' करने वाले अवसरवादी गुटों की नहीं, बल्कि ऐसे दूरदर्शी नेतृत्व की आवश्यकता है जो खुली हवा में एक मजबूत, पारदर्शी और स्थायी भविष्य का निर्माण कर सके.
(डिस्क्लेमर: लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रयागराज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और भारतीय राजनीति के गंभीर अध्येता और विश्लेषक हैं.इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)