परिवारवाद से व्यक्तिवाद की तरफ सपा, क्यों मुलायम से अलग दिखता है अखिलेश का पार्टी चलाने का तरीका

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उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा होने वाले हैं. राज्य में मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी लगातार सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेर रही है. लेकिन सपा के आक्रामक तेवर के बीच एक बात गौर करने वाली है. समाजवादी पार्टी में चेहरों की कमी दिखती है, हर तरफ केवल अखिलेश यादव का चेहरा होता है. प्रेस कांफ्रेंस से लेकर रैलियों तक, अखिलेश यादव ही दिखते हैं. यह नई सपा का नया स्वरूप है. अब सपा के मुख्य राजनीतिक परिवार यानी सैफई के यादव परिवार के किसी अन्य चेहरे को वह वरीयता नहीं मिलती, जैसी कभी मुलायम सिंह यादव के जमाने में दिखती थी.

इस बात को सुनकर कोई यह मतलब भी निकाल सकता है कि अखिलेश यादव ने पार्टी के भीतर परिवारवाद को कमजोर किया है! लेकिन ऐसा नहीं है. समाजवादी पार्टी की पूरी संरचना शुरुआत से ही परिवार केंद्रित राजनीति पर टिकी हुई है. परिवार की सर्वोच्चता मुलायम सिंह यादव के वक्त भी थी और अखिलेश यादव के समय में भी है. इसलिए परिवारवाद के आरोप अब सपा की राजनीतिक संरचना के लिए पुराने पड़ चुके हैं. लेकिन एक बात नई है. वह है व्यक्ति केंद्रित राजनीति.

व्यक्ति केंद्रित नहीं थी मुलायम की सपा

मुलायम सिंह यादव के समय में सपा व्यक्ति केंद्रित पार्टी नहीं थी. यादव परिवार के ही तमाम अन्य लोगों का भी फैसलों में बड़ा दखल होता है. शिवपाल यादव तो एक तरीके से मुलायम सिंह की सरकार ही चलाते थे. रामगोपाल यादव बौद्धिक वर्ग में पार्टी की पैठ बनाने के लिए काम करते थे और फैसले लेते थे. लेकिन अब वह व्यवस्था बीते दिनों की बात हो चुकी है. 2017 में सपा में शुरू हुए परिवार विवाद के उपरांत चले संघर्ष में अब अखिलेश यादव पूरी तरह स्थापित हैं. उनके निर्णय ही सर्वमान्य होते हैं. लखनऊ से लेकर दिल्ली तक अखिलेश ही अब यादव परिवार का सर्वोच्च और इकलौता चेहरा हैं. 

2024 में स्थापित हुई परिवार में सर्वोच्चता

2024 में सपा को मिली चुनावी सफलता ने अखिलेश यादव को और भी मजबूती के साथ स्थापित कर दिया. इसी चुनाव ने यह भी तय कर दिया कि अब फैसले सर्वोच्च परिवार में भी केवल एक ही जगह से प्रेषित किए जाएंगे.

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भले ही कहा जाता हो कि 2017 के बाद से सपा में इस व्यक्तिवादी राजनीति की नींव पड़ी. लेकिन कहते हैं कि अखिलेश जब सीएम थे, तब भी उनमें सहयोगियों को लेकर भरोसे की कमी थी. शिवपाल से मंत्रालय छीनना, जबरदस्ती पार्टी पर कब्जा दिखाने के लिए खुद को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर लेना, या मुलायम सिंह को मंच पर माइक छीनकर अपमानित करना. ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि कैसे अखिलेश यादव को पार्टी और अपने परिवार के भीतर ही अपने लिए असुरक्षा महसूस होती थी.

पुत्र केंद्रित होने की बजाए परिवार केंद्रित थी मुलायम की राजनीति

दरअसल, मुलायम सिंह यादव की राजनीति पुत्र केंद्रित होने के बजाए परिवार केंद्रित थी. यही वजह थी कि 2012 से 2017 तक की सरकार को अधिकांश समय साढ़े चार मुख्यमंत्रियों वाली सरकार कहा जाता था, जिसमें मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव के अलावा आजम खान का भी प्रभाव था. अखिलेश यादव को कई लोगों के साथ मिलकर सरकार चलानी पड़ती थी. यह मुलायम सिंह यादव के लिए तो सहज था, लेकिन शायद अखिलेश के लिए यह तरीका असहज करने वाला था. फिर जब पारिवारिक विवाद खुलकर सामने आ गया तो पार्टी अपने उस स्वरूप की तरफ बढ़ने लगी जो आज दिखता है.

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इसी वजह से 2017 के बाद कोई भी चुनाव देखें तो सपा के मुख्य चेहरे अखिलेश यादव ही हैं, जबकि 2012 तक यह स्थिति नहीं थी. आजम खान, अमर सिंह जैसे अन्य नेताओं को छोड़ भी दें तो यादव परिवार के भीतर भी कई नेता मुख्य चेहरों के रूप में देखते थे. यादव परिवार के दो दर्जन से अधिक सदस्य राजनीति में सक्रिय थे. पूरी राजनीतिक शक्ति के साथ सक्रिय थे. मुलायम सिंह की छवि इस सभी के मुखिया के रूप में थी. पार्टी के भीतर चर्चा का एक स्वरूप था. उसी आधार पर फैसले भी होते थे. लेकिन अब 2026 की सपा में यादव परिवार के भी सभी चेहरे नेपथ्य में दिखते हैं. परिवार का पावर बैलेंस अब एक ही केंद्र तक सीमित दिखता है. निर्णय का सर्वोच्च केंद्र!

(डिस्क्लेमर: लेखक अतर्रा पीजी कॉलेज बांदा में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, इससे एनडीटीवी का सहमत होना या न होना जरूरी नहीं है.)

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