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उद्धव ठाकरे ने इंडिया गठबंधन की सबसे कमजोर नस दबा दी है

संतोष कुमार
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 09, 2026 18:12 pm IST
    • Published On जून 09, 2026 18:12 pm IST
    • Last Updated On जून 09, 2026 18:12 pm IST
उद्धव ठाकरे ने इंडिया गठबंधन की सबसे कमजोर नस दबा दी है

तमाम अंतरविरोधों के बीच इंडिया गठबंधन की दिल्ली में बैठक हुई. बैठक में शामिल कुछ नेताओं ने एनडीटीवी से दावा किया कि ये मुलाकात कामयाब रही. लेकिन इस बैठक में उद्धव ठाकरे ने वो बात छेड़ दी, जिससे गठबंधन का हर दल बचना चाहता है. उद्धव ने कहा कि 2029 के चुनाव के लिए अभी से पीएम का चेहरा तय कर लेना चाहिए.

गठबंधन का चेहरा कौन?

उद्धव के सवाल से सवाल उठता है कि गठबंधन का चेहरा-लीडर कौन हो सकता है? ये सवाल इतना उलझा हुआ है कि इसी सवाल पर नीतीश कुमार गठबंधन से अलग हो चुके हैं. ममता बनर्जी और कांग्रेस उलझ चुकी हैं. क्या राहुल गांधी? कांग्रेस के हालात और गठबंधन के जज्बात बदल चुके हैं. एक के बाद एक चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस कमजोर हुई है, उसके बाद उसके नेता को गठबंधन अपना नेता मानेगा, इसपर सवाल हैं.

विरोधाभासों का गठबंधन

गठबंधन के दल अक्सर राज्यों में एक दूसरे के खिलाफ लड़ते हैं और केंद्र में एक साथ मिलकर बीजेपी को चुनौती देने की बात करते हैं. ये बात थ्योरी में भी ठीक नहीं लगती, प्रैक्टिकल तो है ही नहीं. इस फलसफे की क्या दिक्कत है, ये समझने के लिए इंडिया गठबंधन की आठ जून को हुई बैठक में सीपीएम नेता जॉन ब्रिटास ने जो कहा उसपर गौर कीजिए. उन्होंने नाराजगी जताई कि विधानसभा चुनाव के समय राहुल गांधी ने पिनराई विजयन और सीपीएम पर बीजेपी से साठगांठ के आरोप लगाए. ब्रिटास ने इसको लेकर न सिर्फ राहुल गांधी बल्कि प्रियंका और खरगे के बयानों को लेकर भी नाराजगी जताई.इसके जवाब में राहुल ने कहा कि वो तो स्थानीय राजनीति के लिहाज से कह रहे थे, कोई निजी हमला नहीं था.

दोनों अपनी जगह सही हैं. अगर कांग्रेस केरल में सीपीएम से लड़ेगी तो स्वाभाविक है कि राहुल गांधी विजयन पर हमला बोलेंगे. ये भी स्वाभाविक है कि सीपीएम राज्य के चुनाव की खटास दिल्ली की बैठक में उड़ेलेगी. यही अंतरविरोध है जो इंडिया गठबंधन का कांटा है. 

क्या दो पार्टियों के कार्यकर्ता कोई AI एजेंट हैं कि लोकसभा चुनाव में एक साथ रहने का कमांड दे दिया जाए और विधानसभा चुनाव में आपस में लड़ने को कहा जाए? क्या किसी कांग्रेस कार्यकर्ता ने लोकल चुनावों में सीपीएम नेता-कार्यकर्ता के खिलाफ हदें पार की हों तो क्या सीपीएम का वो नेता या कार्यकर्ता चुनाव खत्म होते ही सब भुला देगा और उससे भी आगे बढ़कर क्या अगले केंद्रीय चुनाव में दोनों मिलकर काम करेंगे? ऐसी उम्मीद करना Alice in Wonderland जैसी बात नहीं तो क्या है?


केजरीवाल और DMK क्यों नहीं आए?

पंजाब का ही उदाहरण देख लीजिए. वहां आम आदमी पार्टी और कांग्रेस मुख्य प्रतिद्वंदी हैं. अगले साल पंजाब विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. तो ये कैसे संभव है कि वहां केजरीवाल राहुल गांधी के खिलाफ तलवारें निकालें और दिल्ली में आकर तालमेल की बात करें. कार्यकर्ताओं को संभालना तो मुश्किल है ही, मतदाताओं को कैसे समझाएंगे? कोई ताज्जुब नहीं है कि केजरीवाल इस बैठक में नहीं आए.

तमिलनाडु में कांग्रेस ने डीएमके के साथ मिलकर चुनाव लड़ा. नतीजों के बाद टीवीके जीती तो कांग्रेस ने डीएमके से पुराना नाता तोड़ लिया और खुद को विजय सरकार से जोड़ लिया. मौकापरस्त राजनीति के इस दौर में कांग्रेस से इसको लेकर बहुत सवाल पूछे भी नहीं गए. लेकिन फिर ये उम्मीद करना कि वही डीएमके राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया गठबंधन में जोश के साथ शामिल हो और दिल्ली की बैठक में आए, ये सियासी भोलापन नहीं तो और क्या है? 

बैठक में समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने केजरीवाल और डीएमके के नहीं आने को लेकर नसीहत दी कि कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर चलना चाहिए. दिल बड़ा करना चाहिए. लेकिन ये दिल का मामला नहीं है.

स्वार्थ पर सवार, भूल गए मूल आधार 

इंडिया गठबंधन के दलों के साथ आने के पीछे मूल बात है अपना हित. जो ममता बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन को तेवर दिखाती थीं, अब हार के बाद वो गठबंधन से अपनी पार्टी और शायद परिवार को भी बचाने के लिए मदद मांग रही हैं. जिस लेफ्ट का किला ढहाकर ममता ने अपना सियासी महल बनाया, वही लेफ्ट अब ममता से सहानुभूति रखने लगा है.पार्टी के बुनियादी विचार, पार्टी खड़ी होने का मूल आधार, नेपथ्य में हैं. 

जिन नेताओं को दृष्टि दोष होता है वो अक्सर ये देख नहीं पाते हैं कि भारतीय राजनीति में सिर्फ स्वार्थ से काम नहीं चलता. पहली नजर में लग सकता है कि आज विचारधारा का कोई मोल नहीं लेकिन तथ्य कुछ और बताते हैं. आजादी के बाद भारतीय राजनीति का पूरा इतिहास उठाकर देख लीजिए जब भी दलों ने विचारधारा को ताक पर रखकर अटपटे गठबंधन किए हैं, उन्हें अंतत: नुकसान ही हुआ है.

अभी बीजेपी को हराने के लिए सब एकजुट हो रहे हैं, लेकिन इसी बीजेपी को हराने के लिए नीतीश ने अपने धुर विरोधी लालू से हाथ मिला लिया. उसके बाद पलटबाजियों की पूरी पारी खेली. अटपटा गठबंधन था. सरकारें बनीं और गिरीं. आज आप जेडीयू की हालत देख लीजिए. स्वार्थ के सोपान पर चढ़कर राजनीति बहुत ऊपर नहीं जाती.

अटपटे गठबंधन, असामयिक अंत

महाराष्ट्र में हिंदुत्व की लहरों पर उभरी उद्धव की पार्टी शिवसेना ने जब कांग्रेस और एनसीपी से गठबंधन कर सरकार बनाई तो लगा कि भारतीय राजनीति में मौकापरस्ती ही मूल वाक्य है. लेकिन फिर क्या हुआ? उद्धव की पावर तो गई ही, पार्टी भी डूब गई.

और पीछे जाइए. 1977 में इंदिरा के खिलाफ लेफ्ट-राइट-सेंटर सब एकजुट हो गए लेकिन जल्द ही ये कुनबा बिखर गया. इन्हें हटाने के लिए फिर एक अटपटा गठबंधन बना. इंदिरा की कांग्रेस ने चौधरी चरण सिंह को पीएम बनाया लेकिन उन्हें विश्वासमत से पहले ही इस्तीफा देना पड़ा. साल 1989 में राजीव गांधी की कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी लेकिन लेफ्ट और राइट ने मिलकर वीपी सिंह की सरकार बनवाई. लेकिन फिर वही कहानी. मंडल और कमंडल भिड़ गए. दोनों की सोच एकदम अलग थी. 11 महीने के अंदर झगड़ पड़े और राजीव गांधी के समर्थन से चंद्रशेखर की सरकार बन गई. 1996 में देवगौड़ा के नेतृत्व में कांग्रेस ने कांग्रेस विरोधियों से भरी यूनाइटेड फ्रंट की सरकार बनवाई. फिर कांग्रेस ने पहले देवेगौड़ा की सरकार गिराई और इंदर गुजराल को कुर्सी दी लेकन फिर उनकी भी कुर्सी खींच ली. 

जब तक इंडिया गठबंधन इन अंतरविरोधों को मिलकर बैठकर खत्म नहीं करता, कामयाबी मुश्किल है. आप वोटर को क्या संदेश देना चाहते हैं? वोटर आपका साथ क्यों दे? अगर आपकी एकजुटता का मूल कारण ये है कि बीजेपी हमें बर्बाद कर रही है इसलिए हम एकजुट हो गए हैं तो आप एक हारी हुई जंग लड़ेंगे.हर पार्टी एकजुट होने के पीछे जनहित को वजह बताती है लेकिन 'ये भी एक कारण' होने से काम नहीं चलेगा. इसे मूल कारण, केंद्रीय विचार होना पड़ेगा. फिलहाल तो ये नहीं दिखता है. जब वो केंद्रीय विचार मिल जाएगा, राज्यों में अपने छोटे-मोटे हित खुद छोटे लगने लगेंगे. बड़े ईगो छोटे हो जाएंगे.

अगर ऐसा होगा तो शायद उद्धव के सवाल का जवाब भी मिल जाएगा. क्योंकि तब पार्टियों की हैसियत के हिसाब से नेता चुना जाए ये जरूरी नहीं होगा. गठबंधन का एजेंडा मुख्य होगा और नेता गौण. और यहीं से नेता चुनने की नौबत भी बनेगी.

(डिस्क्लेमर: संतोष कुमार एनडीटीवी डॉट इन के वरिष्ठ प्रबंध संपादक हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.) 

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