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रवीश कुमार

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक - The Free Voice, इश्क़ में शहर होना.

  • भारतीय रिज़र्व बैंक और संसद की स्थायी समिति के अनुसार प्रति व्यक्ति आय के मामले में उत्तर प्रदेश और बिहार की हालत बहुत ख़राब है. ये दोनों ही राज्य सबसे नीचे हैं. भूगोल और आबादी के हिसाब से भी भारत के इन दो बड़े राज्यों में अगर लोगों की कमाई इतनी कम है तो आप समझ सकते हैं कि जीवन स्तर का क्या हाल होगा. इन दो राज्यों में उच्च शिक्षा की हालत पर अगर बात करने लगूं तो बात ही खत्म नहीं होगी. इन दोनों राज्यों के युवाओं का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उनकी प्राथमिकता में अच्छी पढ़ाई नहीं है वर्ना मुझे इस पर बात करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती. 
  • उन लोगों ने कभी कहा तो नहीं लेकिन उन्हें पता है कि उनका जीवन कैसे चल रहा है. रिश्तेदारों के व्हाट्सएप ग्रुप में बस यही पूछ लें कि बैंकों में बचत पर मिलने वाले ब्याज का क्या हाल है. वे प्याज़ का रोना रोने लगेंगे ताकि आपका ध्यान बंट जाए और इस सवाल का जवाब नहीं देना पड़े. ऐसे बहुत से लोग हैं जो बैंकों में बचत पर मिलने वाले ब्याज से अपना ख़र्च चलाते हैं. यह एक निश्चित सी कमाई होती है और ज़्यादातर मामलों में सीमित भी. अब अगर ये कमाई भी घटने लगे, माइनस में जाने लगे तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि गोदी मीडिया पर भारत को सुपर पावर बताने की होड़ क्यों मची है. इसीलिए ताकि आम लोगों की खस्ता आर्थिक हालात पर चर्चा न हो सके. जिस तरह से अच्छी नौकरी और अच्छी सैलरी के दिन चले गए उसी तरह से सुरक्षित बचत के भी दिन चले गए. या तो शेयर बाज़ार का खेल सीख लीजिए या फिर माइनस में जा रही कमाई को देखते रहिए. आपके पुराने सारे रास्ते बंद हो चुके हैं. 
  • क्या आप जानते हैं कि कोरोना के इन पौने दो साल के दौरान स्कूल और कॉलेज की फीस कितनी बढ़ी है? हम भी नहीं जानते हैं. मान कर चला जा सकता है कि जो अमीर जनता सौ रुपये लीटर आराम से ख़रीद रही है वही अमीर जनता महंगी फीस भी आराम से ही दे रही होगी. जनता के बीच इतनी स्वीकृति है कि सरकार को अफसोस ही हो रहा होगा कि पेट्रोल का दाम 200 रुपये करना चाहिए था. हालात से हारी हुई जनता के बीच अगर न्यूज़ चैनलों के ऐंकर वीर रस में प्रदर्शन नहीं करते तो राष्ट्र आज कितना कमज़ोर लगता. इन एंकरों की बुलंद और बेशर्म आवाज़ ही इस वक्त हारे का सहारा है. एंकरों की ललकार न होती तो दर्शकों को ताकत की दवा न मिलती. बहुत दिनों के बाद बड़ों को कार्टून के रुप में न्यूज़ चैनल मिल गए हैं. जिस पर टॉम एंड जेरी का खेल चल रहा है . टॉम जेरी का पीछा कर रहा है और जेरी टॉम का. आप इस इंतज़ार में देखे जा रहे हैं कि टॉम को जेरी पकड़ेगा या जेरी को टॉम. 
  • ख़बरों की दुनिया में सूत्रों को लेकर भूचाल आया हुआ है या तो सूत्र बदल गए हैं या फिर पत्रकार पत्रकार नहीं रहे. सवाल है कि ग़लत जानकारी देने वाले पत्रकार ग़लत जानकारी देने वाले सूत्रों के साथ क्या करते हैं. क्या ग़लत जानकारी देने के बाद भी उन सूत्रों के संपर्क में रहते हैं या नए सूत्र बना लेते हैं जो नए सिरे से ग़लत जानकारी दे सके. एक पाठक और दर्शक के लिए सूत्रों के हवाले से आने वाली ख़बरों और पत्रकारिता के संकट को समझना ज़रूरी हो जाता है ताकि पता रहे कि ख़बरों के लिए जिन ज़रूरी तत्वों पर आप भरोसा करते हैं वह भरोसे के लायक है भी या नहीं.
  • किसान आंदोलन में शामिल किसान किसी अहं की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं. वे दशकों से खेती को लेकर सरकारों के वादों का हश्र देख रहे हैं. अपने आस-पास के लोगों को खेती से अलग होते देख रहे हैं.
  • कानून को लेकर केंद्र और राज्य के बीच टकराव का एक नया मोर्चा नीट परीक्षा को लेकर खुल गया है. केंद्र के नागरिकता कानून, कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ कई राज्यों की विधानसभा में प्रस्ताव पास हुए हैं. इस कड़ी में नीट की परीक्षा का मुद्दा भी जुड़ गया है.
  • भारतीय प्रबंध संस्थान  (Indian Institute of Management) का निदेशक बनने के लिए बीए में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होना अनिवार्य है. इससे दुखी होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि इसके बाद भी निदेशक बना जा सकता है. विश्व गुरु भारत में 2017 से यह विवाद चल रहा है. IIM रोहतक के निदेशक धीरज शर्मा की बीए की डिग्री का पता नहीं चल रहा है. इंडियन एक्स्प्रेस की ऋतिका चोपड़ा ने लिखा है कि केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने दो-दो बार पत्र लिखा लेकिन डिग्री का पता नहीं चला और अब तो निदेशक जी का पांच साल का कार्यकाल भी समाप्त होने वाला है. निदेशक से रिपोर्टर ने संपर्क भी किया लेकिन जवाब नहीं दिया. 
  • 24 जून को अमेरिका के फ्लोरिडा में एक इमारत के गिर जाने से 98 लोगों की मौत हो गई. जून से सितंबर आ गया लेकिन अभी तक इस घटना को लेकर अमेरिका के अख़बारों में खोजी पत्रकारिता हो रही है. हर दूसरे दिन कुछ न कुछ रिपोर्ट आती है. पता चलता है कि 100 लोगों के जीवन का क्या महत्व है. इमारत के रख-रखाव में हुई लापरवाही को वहां का समाज और प्रेस कितनी गंभीरता से ले रहा है. 2019 में गुजरात के सूरत में तक्षशिला आर्केड में आग लगने से 22 बच्चे जल कर मर गए थे. उसके बाद क्या हुआ आप खबरों को इंटरनेट में खंगाल कर देखिए. भारत में मार्च और अप्रैल के महीने में ऑक्सीजन के बिना लोग मर गए लेकिन कह दिया गया कि आक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा है. कोरोना की दूसरी लहर के समय अस्पतालों की हालत पर थोड़ी बहुत चर्चा हुई लेकिन उसके बाद चर्चा समाप्त हो गई. अस्पतालों में सुधार के दावे कर लिए गए और मान लिया गया. 2019 में बिहार में चमकी बुखार से 160 से अधिक बच्चे मर गए थे. बिहार के समस्तीपुर के सदर अस्पताल में 10 अगस्त को RT-PCR जांच घर का उदघाटन हुआ. उस दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने छह जांच केंद्रों का आनलाइन उदघाटन किया लेकिन एक महीने बाद भी समस्तीपुर का जांच केंद्र चालू नहीं हुआ है.
  • अक्सर दिल्ली को कार वालों की नज़र से देखा जाता है लेकिन इस महानगर में बोलबाला बाइकर्स का है. 70 लाख से अधिक बाइक यहां पंजीकृत हैं. दिल्ली की सड़कों पर कार और बाइक की रफ्तार बहुत अधिक नहीं है इसलिए यहां की सड़कों पर कार और बाइक के हिसाब से अलग नहीं किया गया है और न करना संभव है.
  • सरकार कभी नहीं बताती कि कितनों को रोज़गार मिला लेकिन यह ज़रूर बताती है कि फलां योजना में कितनों को रोज़गार मिलेगा. मिलेगा के नाम पर आंकड़ा कुछ भी बता दिया जाता है, कभी 50 लाख तो कभी एक करोड़ तो कभी साढ़े सात लाख. आप मंत्रियों के पुराने बयान को निकालेंगे तो यह तो पता चलेगा कि इतना लाख रोज़गार मिलने वाला है लेकिन फिर उस पर दोबारा प्रेस कांफ्रेंस नहीं होती है कि हमने कहा था इतना लाख मिलेगा लेकिन मिला उससे कम या ज़्यादा.
  • करनाल में किसानों के प्रदर्शन ने एक बार फिर से उजागर किया है कि प्रदर्शन करने का अधिकार भी लड़ कर लिया जाता है. करनाल में किसानों ने सचिवालय का घेराव कर सरकार की बनाई लक्ष्मण रेखा की जगह अपनी लक्ष्मण रेखा खींच दी है कि वे कहां तक जा सकते हैं. दिल्ली की सीमाओं पर 9 महीने से रोके गए किसानों ने करनाल शहर के भीतर लघु सचिवाल के पास अपना नया मोर्चा बना लिया है. हज़ारों की संख्या में किसान यहां रात भर मौजूद रहे. खुले आसमान के नीचे रात बिताई. यहीं खाना खाया और सो गए. संयुक्त किसान मोर्चा ने ट्वीट किया कि किसानों ने फुटपाथ पर रात गुज़ारी है. सुबह तक यहां टेंट लगने शुरू हो गए. कोरोना के काल में सेवा करने वाले गुरुद्वारे से श्रद्धालु यहां सेवा देने आ चुके हैं.
  • करनाल में किसान आंदोलन और ज़िला प्रशासन दोनों एक दूसरे के लिए चुनौती बन गए हैं. आज किसान नेताओं और प्रशासन के बीच दो दौर की बातचीत नाकाम हो गई. दोपहर बाद किसान नेताओं ने कहा कि अब वे ज़िला प्रशासन से बात नहीं करेंगे. इसी के साथ फैसला हुआ कि करनाल स्थित लघु सचिवालय की तरफ मार्च किया जाएगा. किसान नेताओं ने कहा कि जो प्रशासन दे रहा है और वो हम नहीं मान सकते और जो हम मांग कर रहे हैं वो प्रशासन नहीं मान रहा है. इसके बाद बड़ी संख्या में किसानों ने लघु सचिवालय की तरफ मार्च शुरू कर दिया. किसानों ने शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ना शुरू किया और प्रशासन ने भी उन्हें आने दिया. दो-दो बैरिकेड पार कर किसान आगे बढ़ते रहे. किसानों की यह संख्या बता रही थी कि सचिवालय के पास पहुंचकर वहां किस तरह की चुनौती होने वाली है. प्रशासन के लिए भी यह चुनौती थी कि वह इतनी भीड़ को संभाले और किसानों के लिए भी संयम से घेराव करने की चुनौती होगी. शाम के वक्त दोनों ओर से तनाव की खास स्थिति नज़र नहीं आई. योगेंद्र यादव ने बयान दिया कि किसानों ने सचिवालय घेर लिया है और शांतिपूर्ण तरीके से सब चल रहा है.
  • किसान आंदोलन के नेता अगर चाहते हैं कि प्रधानमंत्री उनसे बात करें तो उन्हें महापंचायत का आयोजन नहीं करना चाहिए. उन्हें किसान महापंचायतों की जगह कबड्डी, खो-खो, हॉकी का आयोजन करना चाहिए ताकि इन खेलों में विजय प्राप्त करते ही विजयी किसान नेताओं को प्रधानमंत्री का फोन आ जाए और फिर उस बातचीत का वीडियो न्यूज़ चैनलों पर भी ख़ूब चलेगा. यह प्रसंग इसलिए आया कि खिलाड़ियों के लिए सुलभ प्रधानमंत्री किसानों के लिए कितने दुर्लभ हो गए हैं. नौ महीने से अनगिनत महापंचायतों, धरना-प्रदर्शनों और किसान संसद के आयोजन के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी की किसान नेताओं से बात नहीं हुई जबकि उन्होंने कहा था कि वे एक कॉल की दूरी पर हैं. कभी कुछ किसानों का आंदोलन तो कभी बड़े किसानों का आंदोलन बता कर इस आंदोलन को खारिज करने के बाद किसान हर बार अपनी रैलियों के ज़रिए बता रहे हैं कि उनका आंदोलन किसका है. 
  • बेहतर है सब समय रहते हेडलाइन का खेल समझ जाएं वर्ना इस हेडलाइन के पीछे की डेडलाइन सबके लिए ख़तरनाक साबित होगी. मान लीजिए आपके 100 रुपये में से 20 परसेंट डूब गए. एक साल बाद इस बाकी बचे 80 रुपये का 20 या 21 परसेंट वापस आ गया तो क्या इसे लाभ कह सकते हैं? जितना डूबा था उतना भी तो वापस नहीं आया. अगर इसे लाभ कहने की ज़िद पर आ ही गए हैं तो लगे हाथ नुकसान को मुनाफा घोषित कर दीजिए. कम से कम हिन्दी प्रदेशों में ज़्यादातर लोग मान लेंगे क्योंकि यहां लाखों बच्चे दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में गणित में फेल हो जाते हैं. जो पास होते हैं उसमें भी ज़्यादातर खींच खांच कर नंबर लाते हैं. गणित का ऐसा आतंक है कि ट्यूशन से लेकर कोचिंग तक पर मां-बाप लाखों रुपये खर्च कर देते हैं. हिन्दी के अखबार अप्रैल से जून 2021 की जीडीपी 20 प्रतिशत बताते हुए दमदार प्रदर्शन कह रहे हैं. उम्मीद है इसके लिए भी धन्यवाद मोदी जी का पोस्टर लगने लगेगा.
  • चार महीने से भारत की जनता 100 रुपये लीटर पेट्रोल और डीज़ल ख़रीदने के लिए मजबूर है. 90 रुपया लीटर कोई सस्ता नहीं होता है. इस रेट के हिसाब से देखिए तो 2018 सितंबर महीने में मुंबई में पेट्रोल 90 रुपया लीटर हो गया था. तब से आम जनता खुशी-ख़ुशी महंगा तेल भराने के लिए मजबूर है. हर बात में ऐतिहासिक ढूंढने वाली सरकार इस बात का प्रचार नहीं करती है कि पेट्रोल और डीज़ल के दाम ऐतिहासिक स्तर पर पहुंचे हुए हैं और पहुंचने के बाद वापस ही नहीं आ रहे हैं.
  • सिर्फ चार महीने बचे हैं 2021 के. उसके बाद 2022 का वह साल आएगा जिसका इंतज़ार 5 साल से हो रहा है. 2016 में मोदी सरकार ने कहा था कि 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाएगी. कहां तो सरकार और किसानों को चार महीने बाद दोगुनी होने वाली आमदनी के हिसाब लगाने में व्यस्त होना चाहिए, इंडिया गेट में एक घड़ी लगी होनी चाहिए जिस पर हर दिन की कमाई का काउंटर बताया जाता हो कि आज किसानों की आमदनी इतनी हो गई है. 31 दिसंबर 2021 की रात 12 बजते ही किसानों की कमाई इतनी हो जाएगी. लेकिन इसकी जगह किसानों पर लाठियां बरसने लगती हैं. उनके सर और पांव पर पुलिस की लाठी की गिनती होने लगती है.
  • दुनिया इस वक्त अफगानिस्तान को लेकर जितनी चर्चा कर रही है, उसके लिए ज़रूरी सूचनाओं की उतनी ही कमी है. ख़ासकर अफगानिस्तान के आम जीवन से जुड़ी सूचनाएं बहुत कम हैं. महिलाओं के बारे में आशंकाएं जताई जा रही हैं लेकिन उनकी आवाज़ बाहर नहीं आ पा रही है.
  • तालिबान को लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का इतना सा ही संक्षिप्त बयान है कि भारत सभी हिस्सेदारों से बात कर रहा है. इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता है. अफगानिस्तान की घटना से रूबरू कोई भी दर्शक यह समझ सकता है कि सभी हिस्सेदारों का मतलब तालिबान भी है. तालिबान को छोड़ कर सभी हिस्सेदार नहीं हो सकते हैं. इस वक्त अफगानिस्तान में तालिबान ही मुख्य किरदार है और उसका नाम लिए बिना या उससे बात किए बिना क्या सभी हिस्सेदारों से बातचीत की बात पूरी लगती है? नहीं लगती है. भारत को तालिबान का नाम लेने में इतना संकट क्यों है, जबकि दुनिया के कई देश तालिबान का नाम लेकर बयान दे रहे हैं. कनाडा ने जैसे कह दिया कि तालिबान को मान्यता देने के बारे में कोई विचार नहीं है. भारत यही बता दे कि तालिबान के अलावा वहां और कौन हिस्सेदार हैं.
  • आर्थिक सवालों पर फेल हो चुकी या नए आर्थिक दर्शन की जगह पुराने को ही नया स्लोगन बनाकर अपना काम चला रही भारत की राजनीति को एक शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है. राजनीति का भगोड़ा सिस्टम. जिसके तहत हर दल हर नेता मूल सवालों से भाग रहा है. कोई सांप्रदायिकता से लड़ने के बजाए भागने लगता है, शहर में रंगाई पुताई को विकास बता कर उसके पोस्टर लगाने लगता है, तो कोई बेरोज़गारी और ग़रीबी के सवालों से भागने के लिए सांम्प्रायिकता को गले लगाने लगता है. सब भाग रहे हैं लेकिन भागते भागते सब अंत में वहीं पहुंच गए हैं जहां से भागना शुरू किया था. 
  • जब हॉकी को प्रायोजक की ज़रूरत थी, पैसे की ज़रूरत थी तब कोई आगे नहीं आया लेकिन हॉकी के खिलाड़ियों का प्रदर्शन बेहतर हुआ तो सब खिलाड़ियों की मेहनत में अपना हिस्सा जोड़ने पहुंच गए हैं. भारतीय महिला हॉकी खिलाड़ी पदक नहीं जीत सकी लेकिन हारकर भी देश का दिल जीत लिया. प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया कि “देश को गर्वित कर देने वाले पलों के बीच अनेक देशवासियों का ये आग्रह भी सामने आया है कि खेल रत्न पुरस्कार का नाम मेजर ध्यानचंद जी को समर्पित किया जाए. लोगों की भावनाओं को देखते हुए, इसका नाम अब मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार किया जा रहा है. जय हिंद!” इस बात की तारीफ होने लगी और हॉकी को लेकर नवीन पटनायक की तारीफ से सुस्त पड़ा मीडिया ऊर्जावान हो गया. तभी याद दिलाया गया कि मेजर ध्यानचंद के नाम पर तो पहले से पुरस्कार है जिसे 2002 में शुरू किया गया था और 10 लाख रुपया दिया जाता है. ध्यानचंद लाइफ टाइम अचीवमेंट इन स्पोर्टस एंड गेम्स. उसका क्या होगा. कहीं उसका नाम किसी नेता के नाम पर तो नहीं रख दिया जाएगा.
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