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रवीश कुमार

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक - The Free Voice, इश्क़ में शहर होना.

  • क्या स्कॉटलैंड के शहर ग्लासगो में जमा हुए G-20 देशों के कई नेता और कई देशों के प्रमुख धरती के बढ़ते तापमान को रोकने के लिए कोई ठोस फैसला कर पाएंगे? क्या राजनीतिक मजबूरियों और कोरपोरेट के दबाव से मुक्त होकर धरती को बचाने के लिए तुरंत कदम उठाएंगे या फिर टालने और दिखावटी कदम उठाने के कोई नए रास्ते निकाल लिए जाएंगे.
  • बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में जब चुनाव था तब दामों का बढ़ना रुक गया था. चुनाव ख़त्म, दाम बढ़ गया. तब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार कहां था, वो भी इलेक्शन में ड्यूटी कर रहा था?
  • जब सर्वोच्च अदालत अपने फैसले में जॉर्ज ऑरवेल की रचना 1984 का ज़िक्र कर दे तो यह बात लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले किसी भी सरकार के लिए शर्मनाक समझा जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जॉर्ज ऑरवेल का नाम होना ही उन तमाम आशंकाओं को वास्तविकता के करीब ले आता है, जिससे सरकार अनजान बने रहने का नाटक करती है. ऑरवेल का ज़िक्र होना आपातकाल से आगे फासवीदा की आहट का एक ऐसा संकेत है जिसे समझने की ज़िम्मेदारी अदालत ने आम जनता की समझ पर नहीं छोड़ी है बल्कि अपनी तरफ से कह दिया है कि आज का भारत कहां खड़ा है और इस भारत में आपके पीछे कौन दिन रात खड़ा है. बिग ब्रदर इज़ वॉचिंग यू. यह तो सुना होगा आपने. इसी 1984 से आया है जिसके रचनाकार का नाम जॉर्ज ऑरवेल है.
  • भांति-भांति के गोरखधंधों में शामिल अफ़सरों के सहारे किसी को फंसा देने के मामले में भारत में एक नहीं, अनगिनत विश्वगुरु हैं. उनकी कहानियों से दिल दहलता है और बहलता भी है लेकिन ऐसे अफसरों की तादाद इतनी है कि एक को हटा कर दूसरा लाया जाता है और खेल वही चलता है. आर्यन ख़ान ही नहीं, इनके चंगुल में ऐसे कितने ही लोग फंसते चले जाते हैं. पुलिस और जांच एजेंसियों के अपराधीकरण का राष्ट्रीयकरण हो चुका है. एक राष्ट्र, एक अपराधी. बाकी सब उसके सिपाही. अफसर को भी पता नहीं होता कि उसका किस तरह से इस्तमाल होने वाला है. दांव पर सब हैं और छांव में सिर्फ वो है. सबका मालिक एक. आर्यन ख़ान तो सिर्फ एक उदाहरण है. 3 अक्तूबर से आर्यन ख़ान हिरासत में हैं लेकिन उनकी मेडिकल जांच नहीं हुई है. आर्यन के पास से कोई ड्रग्स नहीं मिला है. इसी आधार पर मुकुल रोहतगी ने बांबे हाईकोर्ट के सामने अपनी बहस शुरू की और कहा कि एनसीबी के अधिकारी पुलिस अधिकारी की तरह होते हैं और इनके सामने दिया गया कोई भी बयान कोर्ट में स्वीकार्य नहीं होता है. मुकुल रोहतगी ने यह भी कहा कि उनके मुवक्किल का समीर वानखेडे और पंच को लेकर हुए विवाद से कोई संबंध नहीं है.
  • करोड़ों रुपये खर्च कर देश भर में लगे इस होर्डिंग ने जनता को ठीक से समझा दिया था कि टीका मुफ्त लगा है और इसके लिए धन्यवाद मोदी जी कहना है तभी पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने याद दिला दिया कि यह इतना भी मुफ्त नहीं है. पेट्रोल और डीज़ल पर टैक्स इसलिए अधिक है क्योंकि टीका मुफ्त है. अनाज मुफ्त है.
  • बीस हज़ार करोड़ का 3000 किलोग्राम ड्रग्स पकड़ा गया. उसे लेकर कितना कम कवरेज़ हुआ, छह ग्राम चरस पकड़ा गया उसे लेकर जो कवरेज़ हो रहा है, पता चलता है कि बीस हज़ार करोड़ से ज़्यादा शाहरुख़ ख़ान की कितनी वैल्यू है और उस जनता की कितनी कम वैल्यू हो गई है जो आराम से 117 रुपया पेट्रोल भरा रही है जो कभी 65 रुपया लीटर होने पर आंदोलन करती थी.
  • जनता कहां प्रदर्शन करेगी, क्या उस शहर में प्रदर्शन नहीं होगा जहां कोई मैदान या बड़ा पार्क नहीं होगा और होगा तो सरकार नहीं देगी. भारत में प्रदर्शन शुरू नहीं होता कि बंद कराने की बात होने लगती है. अब अमेरिका में भी प्रदर्शन करने के अधिकारों के खिलाफ कानून बनने लगे हैं.
  • जिस देश में आज़ादी की लड़ाई का आंदोलन 1857 से 1947 तक अलग अलग रूप में चला हो, उस देश के सुप्रीम कोर्ट में शाहीन बाग धरने के बाद किसानों के धरने को लेकर चल रही बहस में अजीब अजीब किस्म के सवाल उठ रहे हैं कि आंदोलन कब तक चलेगा, क्यों चल रहा है, अनंत काल के लिए सड़कें बंद नहीं हो सकती हैं.
  • जम्मू कश्मीर में क्या हो रहा है, यह जानना होगा तो आप किसी न किसी से पूछेंगे. सेना और पुलिस के बयान से किसी घटना की जानकारी मिलती है लेकिन राजनीतिक तौर पर कश्मीर के भीतर क्या हो रहा है इसकी आवाज़ तो उन्हीं से आएगी जिनकी जवाबदेही है. इतना कुछ हो रहा है फिर भी कश्मीर पर कोई विस्तृत प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं है. इसके अलावा बाकी के पारंपरिक रास्ते या तो बंद हो चुके हैं या कमज़ोर कर दिए गए हैं जैसे राजनीतिक दल,नागरिक संगठन, NGO और मीडिया. 5 अगस्त 2019 को धारा 370 की समाप्ति के बाद इन सभी की हालत पर आप गौर कर लेंगे तो पता चलेगा कि कश्मीर पर जानने के लिए आपके पास गोदी मीडिया ही है जो कि ख़ुद नहीं जानता कि वहां क्या हो रहा है. धारा 370 की समाप्ति के दो साल से भी अधिक समय हो चुके हैं, न तो राज्य की बहाली हुई है और न ही राजनीतिक प्रक्रिया को लेकर ठोस पहल. जिसकी बहाली के लिए दिल्ली में 24 जून को दिल्ली में कश्मीर के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री ने बैठक भी की. इस बैठक में कश्मीरी पंडितों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था, न उनका ज़िक्र हुआ था. 
  • बहुत ज़रूरी है कि हम उस उचित स्थान को तय कर दें जिसके न मिलने पर आए दिन राजनीति होती है. तय किया जाना चाहिए कि उचित स्थान का क्या मतलब है और ये कहां पर होता है. इतिहास के जिस मुद्दे को इतिहास की कक्षा में उचित स्थान मिलना चाहिए उसे लेकर टीवी पर चर्चा है और वर्तमान के जिस मुद्दे को मीडिया में उचित स्थान मिलना चाहिए उसके लिए कोई स्थान नहीं है.आम लोगों के लिए पेट्रोल और डीज़ल के दाम उनकी चिन्ता रेखाओं में पहली हेडलाइन की तरह मौजूद है लेकिन अख़बारों और चैनलों के समाचारों में पेट्रोल और डीज़ल के दाम संक्षिप्त ख़बरों के कॉलम और स्पीड न्यूज़ के हवाले कर दिए गए हैं. 
  • विपक्ष के नेताओं को बिना किसी लिखित आदेश के हिरासत में लेने वाली यूपी पुलिस ने एक मंत्री के बेटे के प्रति जो समन का सम्मान दिखाया है, उसकी सराहना की जानी चाहिए क्योंकि आलोचना से कुछ फर्क नहीं पड़ रहा है.
  • 28 सेकेंड का यह वीडियो है. एक सेकेंड के वीडियो में 24 से 30 फ्रेम होते हैं. 840 फ्रेम. 28 सेकेंड के इस वीडियो के एक एक फ्रेम में क्रूरता और मंत्री के झूठ की ऐसी गवाहियां हैं कि इस 28 सेकेंड का पूरा ब्यौरा बताने के लिए 28 घंटे भी कम पड़ जाएं. सोमवार रात दुनिया भर में व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम और फेसबुक के बाद भी अकेले ट्विटर से यह वीडियो इतना वायरल हो गया कि लखीमपुर खीरी के किसानों की हत्या को लेकर फैलाया गया झूठ का शामियाना उजड़ गया. वह वीडियो उस जीप की कहानी का सच लेकर आ गया है जिसने शांति से लौट रहे किसानों को पीछे से कुचल दिया. लेकिन यह वीडियो केवल यह बताने नहीं आया कि किसानों को जीप ने कैसे कुचला, बल्कि यह बताने आया है कि थार जीप और गोदी मीडिया में कोई अंतर नहीं है. जिस तरह से जीप ने किसानों को कुचल दिया उसी तरह गोदी मीडिया हर दिन लोगों को कुचल रहा है. गोदी मीडिया के एंकरों और चैनलों ने आपको नज़रबंद कर लिया है. यह वीडियो नहीं आता तो आपके मन में एक संदेह सच का रूप ले चुका होता कि किसान ही उपद्रवी हैं. और इस तरह से किसानों की हत्या करने वाले आपकी निगाहों में संत हो जाते. 
  • जब कई साल से गोदी मीडिया विपक्ष को रोकने में लगा ही हुआ है तब फिर प्रशासन क्यों विपक्ष को रोकने के लिए इतनी मेहनत करता रहा. जिस पुलिस और कानून व्यवस्था को काम करने देने के नाम पर विपक्ष को रोका गया उसका कुछ रिकार्ड शुरू में ही बता देता हूं. बीजेपी के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर मामले में कौन सी कानून व्यवस्था काम कर रही थी आप फिर से पूरी स्टोरी सर्च कर सकते हैं.  गोरखपुर में मनीष गुप्ता की हत्या के संबंध में भी मुआवज़े और नौकरी का ऐलान हो गया लेकिन अभी तक पुलिस ने छह पुलिस वालों को गिरफ्तार नहीं किया है.
  • हमारा इरादा बस इतना है कि शिक्षा पर बात हो. केवल पटना के कॉमर्स कालेज पर बात नहीं हो. अगर भारत का कोई छात्र इस कार्यक्रम को देख रहा है, और वह समझ पा रहा है कि उसके जीवन को किस तरह से बर्बाद किया गया और बर्बाद करने की प्रक्रिया आज भी जारी ही है तो वह छात्र एक काम करे.
  • पढ़ने के लिए पलायन, इस निगाह से देखिए तो भारत का युवा जहां भी है वहां से पलायन कर रहा है. इस पलायन पर खर्च होने वाले बजट को जोड़ेंगे तो पता चलेगा कि अच्छी शिक्षा के लिए जब कोई पलायन करता है तब उस पर एक एक परिवार के लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं. ख़राब कालेज और यूनिवर्सिटी के कारण पढ़ने वाला यह आर्थिक बोझ हर परिवार की तरक्की रोक रहा है. एक राज्य के भीतर का नौजवान अपने गांव कस्बे से ज़िले की तरफ भाग रहा होता है. ज़िला-ज़िला भाग लेने के बाद वह अपने राज्य की राजधानी की तरफ पलायन करता है. राजधानी जाकर भी उसकी मुलाकात अच्छी इमारतों वाली घटिया यूनिवर्सिटी और घटिया कालेज से होती है. फिर वहां फंसे कुछ युवकों में से कुछ दूसरे राज्यों की राजधानी की तरफ भागते हैं. वहां से भागते-भागते दिल्ली की तरफ भागते हैं.
  • सूचनाओं की रफ़्तार इतनी तेज़ हो चुकी है कि किसी मुद्दे पर बात करना और बात नहीं करना दोनों ही बराबर हो चुका है. एक बदलाव और हुआ है. राज्य की सत्ता की तरफ से और उसकी ख़ुशामद में ऐसी सूचनाएं पैदा की जा रही हैं जो दरअसल सूचनाएं हैं ही नहीं. जिनका काम ज़रूरी मुद्दों से जुड़ी सूचनाओं पर पर्दा डालना है. ठीक उसी तरह से जब ट्रंप अहमदाबाद आए तो सड़क किनारे की बस्ती की ग़रीबी न दिख जाए इसके लिए दीवार बना दी गई. उस दीवार को रंग दिया गया. यही काम न्यूज़ चैनल और अख़बार करते हैं. आपकी गरीबी बेकारी, स्वास्थ्य पर बात न करके, फालतू टाइप के विषय की दीवार खड़ी कर देते हैं और आपको ट्रंप की तरह सूचनाओं के नए और झूठे एक्सप्रेस वे से गुज़ारते हुए सीधे झूठ के स्टेडियम में ले जाते हैं. समाचार जगत के संपर्क में आएं तो समाचार के लिए नहीं आएं. समाचार तो बंद हो चुका है. प्रोपेगैंडा का खेल अगर नहीं समझेंगे तो जल्दी ही दो सौ रुपए लीटर पेट्रोल ख़रीदेंगे और बोल नहीं पाएंगे. 
  • एक साल के दौरान किसान आंदोलन कई बार भारत बंद कर चुका है. हर बार भारत बंद के दौरान किसानों ने इस बात का ख़्याल रखा है कि जनता को कम से कम तकलीफ हो इसलिए भारत बंद चार बजे तक ही रखा गया है. चार बजते ही किसानों ने दिल्ली मेरठ एक्सप्रेस वे खोल दिया. भारत बंद करने वाले किसान अपने भारत में ख़ुद ही बंद नज़र आ रहे हैं.
  • भारतीय रिज़र्व बैंक और संसद की स्थायी समिति के अनुसार प्रति व्यक्ति आय के मामले में उत्तर प्रदेश और बिहार की हालत बहुत ख़राब है. ये दोनों ही राज्य सबसे नीचे हैं. भूगोल और आबादी के हिसाब से भी भारत के इन दो बड़े राज्यों में अगर लोगों की कमाई इतनी कम है तो आप समझ सकते हैं कि जीवन स्तर का क्या हाल होगा. इन दो राज्यों में उच्च शिक्षा की हालत पर अगर बात करने लगूं तो बात ही खत्म नहीं होगी. इन दोनों राज्यों के युवाओं का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उनकी प्राथमिकता में अच्छी पढ़ाई नहीं है वर्ना मुझे इस पर बात करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती. 
  • उन लोगों ने कभी कहा तो नहीं लेकिन उन्हें पता है कि उनका जीवन कैसे चल रहा है. रिश्तेदारों के व्हाट्सएप ग्रुप में बस यही पूछ लें कि बैंकों में बचत पर मिलने वाले ब्याज का क्या हाल है. वे प्याज़ का रोना रोने लगेंगे ताकि आपका ध्यान बंट जाए और इस सवाल का जवाब नहीं देना पड़े. ऐसे बहुत से लोग हैं जो बैंकों में बचत पर मिलने वाले ब्याज से अपना ख़र्च चलाते हैं. यह एक निश्चित सी कमाई होती है और ज़्यादातर मामलों में सीमित भी. अब अगर ये कमाई भी घटने लगे, माइनस में जाने लगे तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि गोदी मीडिया पर भारत को सुपर पावर बताने की होड़ क्यों मची है. इसीलिए ताकि आम लोगों की खस्ता आर्थिक हालात पर चर्चा न हो सके. जिस तरह से अच्छी नौकरी और अच्छी सैलरी के दिन चले गए उसी तरह से सुरक्षित बचत के भी दिन चले गए. या तो शेयर बाज़ार का खेल सीख लीजिए या फिर माइनस में जा रही कमाई को देखते रहिए. आपके पुराने सारे रास्ते बंद हो चुके हैं. 
  • क्या आप जानते हैं कि कोरोना के इन पौने दो साल के दौरान स्कूल और कॉलेज की फीस कितनी बढ़ी है? हम भी नहीं जानते हैं. मान कर चला जा सकता है कि जो अमीर जनता सौ रुपये लीटर आराम से ख़रीद रही है वही अमीर जनता महंगी फीस भी आराम से ही दे रही होगी. जनता के बीच इतनी स्वीकृति है कि सरकार को अफसोस ही हो रहा होगा कि पेट्रोल का दाम 200 रुपये करना चाहिए था. हालात से हारी हुई जनता के बीच अगर न्यूज़ चैनलों के ऐंकर वीर रस में प्रदर्शन नहीं करते तो राष्ट्र आज कितना कमज़ोर लगता. इन एंकरों की बुलंद और बेशर्म आवाज़ ही इस वक्त हारे का सहारा है. एंकरों की ललकार न होती तो दर्शकों को ताकत की दवा न मिलती. बहुत दिनों के बाद बड़ों को कार्टून के रुप में न्यूज़ चैनल मिल गए हैं. जिस पर टॉम एंड जेरी का खेल चल रहा है . टॉम जेरी का पीछा कर रहा है और जेरी टॉम का. आप इस इंतज़ार में देखे जा रहे हैं कि टॉम को जेरी पकड़ेगा या जेरी को टॉम. 
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